आत्मकथा : ज़िंदगी एक सफर है सुहाना
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प्राक्कथन :
मैंने अपना लेखन आत्मकथा से शुरू किया था. मेरी आत्मकथा के तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं, 'न वो समझ सके न हम' (2013), 'पल पल ये पल' (2014) और 'दुनिया रंग बिरंगी' (2015). एक साधारण मनुष्य की जीवन यात्रा को जितना पढ़ा और सराहा गया, वह मेरी अपेक्षा से बहुत-बहुत ज्यादा रहा. पाठकों की प्रतिक्रिया को यदि एक साथ संकलित किया जाए तो एक पूरी पुस्तक बन जाएगी. उन प्रतिक्रियाओं में एक बात आम रही कि उन्हें मेरी कहानी अपनी कहानी जैसी लगी. परिवार में रहने और जीने की विवशता सबकी लगभग एक जैसी हुआ करती है, वैसे, अपवाद भी होते हैं. उनकी परेशानियों को मैं शब्द दे सका, यह मेरा सौभाग्य है लेकिन इस चक्कर में मैं और मेरा परिवार सार्वजनिक हो गया लेकिन यह जोखिम मैंने उठाया.
मेरे कुछ पाठक बहुत समय से आग्रह कर रहे हैं कि मुझे तीसरे खंड के आगे की कथा लिखनी चाहिए. बहुत दिनों तक टालता रहा क्योंकि उसके बाद की बहुत सी घटनाएं मेरे यात्रा वृतांत में अंकित हैं, फिर भी, और भी बहुत सी घटनाएं हुई हैं जिन्हें क्रमबद्ध करके रही-सही कसर पूरी की जा सकती है. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने का साहस संजो रहा हूं, लिख रहा हूं, 'ज़िंदगी एक सफर है सुहाना', मेरी आत्मकथा का अगला खंड.
जीवन एक सफर है, हम सब यात्री हैं. कुछ समय के लिए इस पृथ्वी पर आए हैं, समय पूरा होने पर निकल जाएंगे. मैं अपने जीवन कि बातें इसलिए लिख रहा हूँ ताकि उनका दस्तावेजीकरण हो जाए और आने वाली पीढ़ी को यह ज्ञात हो सके कि उनके पूर्वजों ने कैसे अपना जीवन बिताया!
जीवन में इतने उतार-चढ़ाव रहे कि उतरते-चढ़ते सांसें फूलने लग गई हैं लेकिन सच तो यह है कि अगर जीवन ऐसा न होता तो शायद इतना मज़ा भी वहीं आता. तकलीफें न हों तो आराम का अहसास कैसे होगा, दुख न हों तो सुख का पता कैसे चलेगा?
इसलिए यात्रा जारी है...चलते रहो.
(1)
पुराने जमाने में एक बात सुनी थी कि डायन यदि एक बार घर देख लेती है तो बार-बार आती है. डायन होती है या नहीं, पता नहीं लेकिन शरीर को एक बार बीमारी ने खोज लिया तो वह बार-बार आती है. शरीर विज्ञान की गहराई में जाएं तो इसके भीतर असंख्य कोशिकाएं हैं जिनके संचालन से हमारा शरीर चलायमान रहता है. न जाने किस कोशिका में कब और कैसी अंतःप्रतिक्रिया होती है कि वह किसी रोग के रूप में प्रगट हो जाती है. कैंसर की बीमारी शरीर की कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण होती है, जिससे असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं लेकिन कैंसर क्यों होता है, इसका सही-सही पता अभी तक नहीं चल पाया है.
सन 2002 मे मेरे दाहिने गाल के भीतर कैंसर हुआ था, इंदौर में डा. दीपक अग्रवाल ने सर्जरी की थी. तीन साल बाद जब मैंंने उन्हें दिखाया तो उन्होंने कहा, 'अब आपको कैंसर नहीं होगा द्वारिका प्रसाद जी.'
सन 2008 में उसी जगह पर फिर से कैंसर के लक्षण उभर आए. इस बार मुम्बई के कोकिलाबेन अम्बानी हास्पिटल के डा. मंदार देशपांडे ने सर्जरी की.
लगभग दो साल बाद फिर से कैंसर ने हमला किया लेकिन इस बार बाएं गाल पर, इस बार भी डा. मंदार देशपांडे ने ही सर्जरी की. दरअसल डायन ने मेरा घर देख लिया था, वह बार-बार मेरे घर आ रही थी. सर्जरी के बाद तीन दिनों तक मुंह के भीतर रुई ठुसी हुई थी, चौथे दिन निकली तो कुछ बोलना-चालना शुरू हुआ. नाक से एक पाइप डाला गया जिससे तरल खाद्य पदार्थ पेट तक पहुंचाया जा रहा था. डा. मंदार देशपांडे रोज दो बार मुझे देखने के लिए कमरे मेंआया करते थे. मुझसे मेरा हाल-चाल पूछते, मैं उनसे कहता, 'मैं बिलकुल ठीक हूं.' वे खुश हो जाते.
एक दिन मैंने उनसे पूछा, 'डाक्टर साहब, कैंसर क्यों होता है?' वे बोले, 'पक्के तौर पर इसका कारण मालूम नहीं है. हम लोग मरीजों के इतिहास का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो लोग तम्बाखू, सिगरेट और शराब का अधिक सेवन करते हैं, वे इस बीमारी का शिकार हो जाया करते हैं लेकिन ऐसा भी पाया गया है कि जिन लोगों ने अपने जीवन में इनका उपयोग नहीं किया है जैसे महिलाएं और बच्चे, वे भी कैंसर के शिकार हो जाते हैं. इस कारण से केवल तम्बाखू, सिगरेट और शराब को दोष नहीं दिया जा सकता है. चिकित्सा वैज्ञानिक खोज में लगे हुए हैं कि इस बीमारी की जड़ का पता लग जाए.'
मैं तीनों बार कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था में सक्रिय होकर डाक्टर की शरण में चला गया, सम्भवतः इसीलिए ठीक हो गया अन्यथा घरेलू, आयुर्वैदिक, यूनानी, होम्योपैथी या प्राकृतिक चिकित्सा के चक्कर में फंसता तो कैंसर के अधिक फैल जाने के कारण जब एलोपेथी अपने हाथ खड़े कर देती है तब बचना असम्भव हो जाता है. मेरे दामाद डा. केदारनाथ और बेटी डा. संगीता को इस बात का श्रेय जाता है कि इन दोनों ने मेरे रोग को शुरुआती दौर में पहचान लिया और एक दिन की देर किए बिना मुझे ऑन्कोलाजिस्ट के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया. इन्हीं दोनों के कारण आज मैं जीवित हूं.
सन 2026 में पुनः बाएं गाल के अंदर कैंसर के लक्षण उभरे. मैं और संगीता दोनों मुम्बई पहुंचे, डा. मंदार देशपांडे के पास, उन्हें दिखाने. डाक्टर मुझे देखते ही खुश हो गये और बोले, 'अंकल, आप?' जिस मरीज की उन्होंने सोलह साल पहले कैंसर की सर्जरी की थी, वह 78 वर्ष का व्यक्ति यदि सामने खड़ा हो तो आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है. उन्होंने मेरी जांच की और कहा, 'ऊपरी तौर पर देखने में मुझे आपके मुंह में कैंसर नहीं दिखाई दे रहा है. जो सफेद धब्बा है वह दवा से ठीक हो जाएगा.'
इस बार मैं फिर डायन के प्रकोप से बच गया.
शरीर और बीमारी का सम्बंध सदा से चला आ रहा है. वातावरण की अशुद्धता, खान-पान में लापरवाही, जलवायु का दुष्प्रभाव, संक्रमण, दुर्घटनाएं आदि कई कारण होते हैं जो शरीर के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं. ये शरीर में चुपचाप प्रविष्ट हो जाते हैं और फिर अपना हुनर दिखाते हैं. हमारा शरीर इतना सम्वेदनशील है कि वह समझ जाता है कि कुछ तो गड़बड़ है और वह संकेत देने लगता है. आप-हम उस संकेत को न समझें या उसकी ओर ध्यान न दें, यह हमारी भूल है.
अधिकतर लोग स्वयं किसी डाक्टर से कम नहीं होते, वे अपने अनुमान से दवा खाकर ठीक होने का प्रयास करते है. जब रोग आगे बढ़ता है तब वे यह तय करते हैं कि किससे इलाज़ करवाया जाए? मतलब, एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथी, यूनानी या प्राकृतिक चिकित्सा. छोटी-मोटी तकलीफों में कोई भी पद्धति कारगर हो जाती है लेकिन मस्तिष्क, हृदय, यकृत, पेट और कैंसर जैसी बीमारी में एलोपैथी अधिक विश्वसनीय एवं कारगर सिद्ध होती है.
एक तो कैंसर का प्रारम्भिक स्तर पर पता लगना मुश्किल होता है क्योंकि मरीज की ओर से सही पद्धति के चुनाव में देरी, सही डाक्टर तक पहुंचने में होने वाली देरी, सेम्पल की जांच की रिपोर्ट आने में देरी आदि कारण स्वाभाविक हैं. कैंसर का पता लगने के बाद उससे तुरंत मुकाबले की तैयारी करना अनिवार्य होता है. सही अस्पताल और सही डाक्टर का चयन इसमें बेहद महत्वपूर्ण होता है. मरीज का शर्तिया इलाज़ करने के लिए सभी तैयार बैठे हैंं, भले ही उन्हें उपचार करना आता हो या न आता हो. यहीं पर मरीज़ का भविष्य तय होता है कि वह ठीक हो जाएगा या सदा के लिए 'ठीक' हो जाएगा.
कैंसर बेढब बीमारी है. यदि शुरू में पकड़ आ गई और सही इलाज़ चालू हो गया तो मरीज बच जाता है अन्यथा रोग बढ़ जाने पर इतना सताता है कि मरीज दर्द की अधिकता की वज़ह से कराहता हुआ हर क्षण मृत्यु की कामना करता है लेकिन मृत्यु जल्दी नहीं आती, न जाने क्यों, बहुत देर करती है. उस समय न केवल मरीज़ बल्कि उसके परिवारजन भी घोर यंत्रणा से गुजरते हैं. हृदय की धड़कन रुक जाना जैसे सबसे सहज मौत है, उसके ठीक उलट कैंसर की यंत्रणा है, बहुत-बहुत कष्टदायक मौत. काश यह बीमारी हमारी दुनिया से मिट जाए!
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(2)
पुरानी एक घटना का ज़िक्र रह गया था. जैसा कि मैंने आपको बताया था कि घोर आर्थिक कष्टों के बीच भी मैंने अपनी पत्नी माधुरी से उनके आभूषणों को बिकने से बचाए रखा. उन्होंने कई बार पहल की लेकिन मैंने सदैव मजबूती के साथ मना किया. उनके जो गहने थे उसमें से कुछ गहने उनकी ननदों और देवर की शादी में लग गए थे, फिर भी उनके पास काफी गहने बचे थे जो बैंक के लाकर की शरण में सुरक्षित पड़े हुए थे.
वे कुछ दिनों के लिए जबलपुर अपने मायके गयी और जब लौटकर आयी तो मुझे बहुत सारे रुपए दिए और कहा, 'ये लो और अपना कर्ज़ कम करो.'
मैंने पूछा, 'इतनी रकम कहाँ से लायी?'
'मैंंने गहने बेच दिए.'
'अरे, कैसे और क्यों बेच दिया, मुझसे चर्चा तक नहीं की.'
'तुम्हें बताती तो तुम मना कर देते इसलिए नहीं बताया. गहने जबलपुर अपने साथ लेकर गयी थी, वहाँ अपने भाई मदन को दे दी, उसने बेचकर ये पैसे मुझे दे दिए.' उन्होंने बताया. मैं अपना माथा पकड़ कर बैठ गया. वे आगे बोली, 'देखो, ये गहने बैंक के लाकर में बेकार पड़े हुए थे. मेरे किसी काम के नहीं थे. पहले कभी-कभार पहन लिया करती थी लेकिन मैंने इन्हें कम्मू के आश्रम जाने के बाद पहनना बिलकुल बंद कर दिया. दोनों बेटियों की शादी हो गई, अब इन गहनों का क्या काम?'
'कुछ बचाया या नहीं?'
'शादी में मिला एक मूँगा जड़ा का सेट बचा लिया है.' वे धीरे से बोली.
मैं क्या कहता? चिड़िया उड़ चुकी थी. उस दिन मुझे समझ में आया कि गृहिणी क्या होती है. सुनते हैं कि स्त्रियां गहनों को अपने सीने से लगाकर रखती हैं, उन्हें पहनकर और लोगों को दिखाकर खुश हुआ करती हैं लेकिन यहां तो एकदम विपरीत घटना हो गयी. माधुरी के मायके में सोने-चांदी के गहनों की दूकान है. विवाह के पहले वे बदल-बदल कर गहने पहना करती थी. खूब शौक था. विवाह के समय भी उनके पास भरपूर गहने थे, शादी-ब्याह के समारोहों में लक-दक पहन कर जाया करती थी. हमारे बेटे कुंतल के संन्यस्त होने के बाद तो उन्होंने सजना-संवरना जैसे त्याग सा दिया. गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ की उंगली में तांंबे की सर्प आकृति की अंगूठी. हाँ, कानों में हीरे की टाप्स विवाह के बाद अभी तक कायम है.
जो कर्ज़ था मेरे ऊपर, वह सब पट गया. सबको हाथ जोड़कर जितना लिया था, वापस किया और मुसीबत के दिनों में मुझ पर विश्वास करने और सहयोग देने के लिए धन्यवाद दिया. अब 'अच्छे दिन' आ गये थे.
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(3)
इस लेखक के साथ यह परेशानी है कि समय और काल को लेकर असावधान रहता है. कैंसर की चर्चा चली तो आपको 2026 तक ले आया जबकि 2007 की घटनाओं को बताना था लेकिन 'जम्प' मार गया. चलिए, वापस चलते हैं.
हमारे पुत्र कुंतल को कोयंबत्तुर गये चार साल हो गये थे. हम लोगों ने उसके निर्णय को न चाहते हुए भी स्वीकार कर लिया क्योंकि इंसान जो काम करना चाहता है, जब उसे करता है तो बेहतर परिणाम आते हैं और करने वाले को आनंद भी मिलता है. हमें समझ में आ रहा था कि उसने अपने जीवन को बेहद कठिन मार्ग पर झोंक दिया है लेकिन उसे गए इतना समय बीत चुका था कि ऐसा समझ में आया कि वह वहां रम गया है. इस बीच उसने योग सिखाने के लिए उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के अनेक शहरों की यात्रा की, टीम लीडर के रूप में कई बार केदारनाथ-बद्रीनाथ-गंगोत्री और मानसरोवर-कैलास तक गया. धीरे-धीरे वह आश्रम के कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में विकसित होता चला गया. बीच-बीच में हम लोग उससे फोन पर संपर्क करके बात कर लिया करते थे.
एक बार की बात है, मुम्बई में सद्गुरु का एक कार्यक्रम होने वाला है, उसके प्रचार के लिए वे पुणे में थे. रात को लगभग ग्यारह बजे फोन पर बात हुई. मैंने उनकी गतिविधियों के बारे में पूछा. फिर पूछा, 'अभी क्या कर रहे हो?'
'खाना बना रहा हूं.' उसने उत्तर दिया.
'इतनी रात को? वह भी स्वयं?'
'हां, अभी कार्यक्रम का 'प्रमोशन' करके वापस आया हूं. जिनके घर में मैं ठहरा हुआ हूं वे बाहर गये हुए हैं और फ्लेट की चाबी मुझे देकर गए हैं. उनके किचन में खाना बन रहा है.'
'क्या बना रहे हो ?'
'अब इसका नाम क्या बताऊं आपको. यहां किचन में जो कुछ मुझे दिखा और मिला सबको मिलाकर कुकर में पका रहा हूं.'
'बेटा, मुझे तुम्हारी बहुत फिक्र होती है. तुम्हारे खाने तक का कोई ठिकाना नहीं है.'
'पापा, आप मेरी चिंता न करें, सद्गुरु सब प्रबंध कर देते हैं.' उसने हंसते हुए उत्तर दिया. मैं चुप रह गया.
कुंतल की सद्गुरु के प्रति निष्ठा समझ में आ रही थी लेकिन घर-परिवार के प्रति उसकी उदासीनता हम लोगों की समझ के बाहर था. आखिर कौन सा आकर्षण है उनमें कि उसने अपना सर्वस्व उन पर न्यौछावर कर दिया? एक दूसरा सवाल यह भी उठता था कि पूरी तरह से सांसारिक मनुष्य, हंसी-मज़ाक करने वाला इंसान, नाचने-गाने वाले सहज व्यक्ति के मन में परिवार के प्रति इतना विकर्षण क्यों हो गया?
हम पति-पत्नी दोनों ने इस विषय पर बहुत बातचीत की, चिंतन किया लेकिन वह सूत्र समझ में नहीं आया कि कुंतल सद्गुरु से क्यों प्रभावित हुआ? इस बीच हम लोग आश्रम जाते रहे, कुंतल से मिलते रहे लेकिन हमारी नज़दीकी नहीं बनी बल्कि एक दूरी स्पष्ट समझ में आने लगी. एक बात दिमाग में आयी कि एक बार हमें आश्रम की गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना चाहिए ताकि हम आश्रम से परिचित हो सकें, शायद तब वह कारण हमारी समझ में आए.
7 जुलाई 2007 को कोयम्बत्तुर स्थित आश्रम में एक कार्यक्रम शुरू होने वाला था जिसका नाम था 'होलनेस प्रोग्राम'. यह कार्यक्रम सात दिनों का था और अंग्रेजी भाषा में होना था. माधुरी को अंग्रेजी भाषा समझ में नहीं आती इसलिए वे जाने में हिचक रही थी. मैंने उन्हें समझाया, 'चलो, समझ में नहीं आएगा तो चुपचाप सुनते रहना और जो गतिविधियां होंगी, उन्हें देखकर करते जाना.' वे तैयार हो गयी. हम दोनों 6 जुलाई को आश्रम पहुंच गये. अगली सुबह हम लोग 'स्पंदा हाल' में प्रविष्ट हो गये. हमारे मोबाइल काउंटर में जमा करवा लिए गए ताकि अगले सात दिनों तक हम सब बाहर की दुनिया को भूल कर अपना ध्यान कार्यक्रम में एकाग्र कर सकें.
'प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'जी?'
'आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए?'
'पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'क्या बहुत दर्द है?'
'हाँ, बहुत अधिक।'
'क्या मैं आपके कमर में 'आइंटमेंट' लगा दूँ?' वह अपने साथ वोलिनी आइंटमेंट और दर्दनिवारक गोलियां लेकर आई थी।
'पहले से बेहतर।'
'एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है?'
'और भी अच्छा।'
'तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'
'कैसे चढ़ोगे तुम? तुम्हारी कमर का दर्द?' माधुरीजी ने पूछा।
'दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा!'
'रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो?'
'वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'तो, फिर चलो।' वे बोली।
मुझे उस समय तत्क्षण निर्णय लेना था. मस्तिष्क में कई प्रश्न एक साथ उभरे, समय कम था. मुझे सूझा कि ट्रेन से उतर जाना चाहिए और मैंने अपना चढ़ा हुआ सामान डिब्बे से बाहर फ़ेंक दिया और खुद भी उतर गया. दोनों कुली दौड़ते हुए आए, हमारा बिखरा सामान समेटा और पीछे मुड़कर ‘सेठानी’ को खोजा तो सेठानी गायब!
हज़रत निज़ामुद्दीन रेल्वे स्टेशन का प्लेटफ़ार्म सीधा नहीं वरन थोड़ा ‘कर्व्ह’ लिए हुए है इसलिए मैं कुलियों को ही सामान तकवा कर ‘ओवर ब्रिज’ तक वापस गया लेकिन माधुरी मुझे कहीं नहीं दिखी, आखिर गई कहाँ ? मैं बेहद चिन्तित हो गया कि वे कहाँ होंगी ? यदि वे ट्रेन में चढ़ गई हों तो उनके पास मोबाइल फ़ोन नहीं है, उन्हें कोच और बर्थ नम्बर भी मालूम नहीं है, कैसा करेंगी? खैर, मैं अपने सामान तक वापस पहुंचा जहां दोनों कुली खड़े थे, मैंने उनसे पूछा- ‘जब वे ट्रेन में नहीं चढ़ी तो कहाँ गई?’
‘तो फ़िर वे बाद में चढ़ गई होंगी पर हमने उनको डिब्बे में चढ़ते हुए नहीं देखा.’ वे बोले.
‘फ़िर कैसा किया जाए?’
‘जैसा आप बोलें.’
‘चलो वापस, टिकट-खिड़की के पास सामान ले चलो.’ मैंने उनसे कहा. लगभग पौन घन्टे बाद मेरा मोबाइल बजा, किसी यात्री के मोबाइल फ़ोन से उन्होंने बात की और मुझसे पूछा, ‘कब से तुमको खोज रही हूँ, तुम कौन से कोच में हो और बर्थ नम्बर क्या है?’
‘मैं तो हजरत निज़ामुद्दीन स्टेशन में हूँ, तुम कहाँ हो?’
‘मैं तुम्हें यहां एक-एक कोच में खोज रही हूँ, मुझे न तो कोच मालूम है और न बर्थ नम्बर, पर तुम तो ट्रेन में चढ़ गए थे, मैंने तुम्हें चढ़ते देखा था फ़िर उतरे क्यों?’
‘कुली ने मुझे आवाज देकर बताया कि तुम नहीं चढ़ पाई.’
‘अरे नहीं, जब मैंने देखा कि तुम सामान सहित डिब्बे में चले गए हो तो पीछे के डिब्बे में दौड़ कर चढ़ गई.’
‘अब कैसा किया जाए? तुम एक काम करो, मैं तुमको कोच और बर्थ नम्बर बताता हूँ, वहाँ जाकर बैठो और अगले स्टापेज आगरा में उतर जाना, मैं कोई दूसरी ट्रेन पकड़कर आगरा पहुँचता हूँ.’
‘तुम न जाने कब आगरा पहुँचोगे, मैं वहाँ अकेले प्लेटफ़ार्म में नहीं बैठ सकती, अब अन्धेरा भी हो गया है, ठंड लग रही है. मैं तो अब बिलासपुर जा रही हूँ.’
‘कैसे जाओगी? न तुम्हारे पास टिकट है, न पैसे हैं, न पानी है, न खाना है और न ही ओढ़ने-बिछाने का है.’
‘तुम मेरी चिन्ता छोड़ो, कोई न कोई मदद मुझे मिल जाएगी, मैं देखती हूँ. तुम अपना इन्तज़ाम बनाओ और सामान लेकर बिलासपुर पहुँचो. मैं चली.’ माधुरी ने अपना निर्णय सुनाया.
ट्रेन में माधुरी विचित्र संकट का सामना कर रही थी. उन्हें प्यास लगी तो हमारी आरक्षित सीट पर ही अनधिकृत रूप से विराजमान सहयात्री से पानी मांगा तो उसने देने से इंकार कर दिया और कहा, ‘यह पानी नहीं, बंगला साहेब का पवित्र जल है, आपको नहीं दे सकती.’ आस-पास कुछ छात्राएं बैठी थी लेकिन किसी के पास पानी नहीं था, पास में दस रुपए भी न थे कि पानी की बाटल खरीद सकें. छात्राएं रायपुर की थी. उनके एक ग्रुप लीडर साथ में थे जो माधुरी की परिस्थिति को समझ कर मदद के लिए आगे आए. उन्होंने माधुरी को एक सौ रुपए दिए, टीटी से बात की और ‘सेटिंग’ की. एक छात्रा ने अपनी शाल दी, इस प्रकार उन मददगारों के मिल जाने से माधुरी के संकट का समाधान हो गया. अंततः वे बिलासपुर पहुंच गई. मैं भी अगले दिन सारा सामान लेकर जब घर पहुंचा तब मेरी सांस में सांस आई. यह रहा, हमारी ध्यान यात्रा का समापन!
इस आश्रम में पहली बार मैं 2003 में आया था, आश्रम देखने गया था, कुछ समझ नहीं आया। वो दुनिया हमारी दुनिया से अलग है। काम, व्यस्तता और समस्याएँ जैसी हमारी दुनिया में हैं, वैसी उस दुनिया में भी है लेकिन फर्क है। फर्क यह है कि हम अपने जीवन के बाहरी आयाम को विकसित करने के यत्न करते हैं जबकि वे जीवन के आंतरिक आयाम को छूने का प्रयास करते हैं। हमें उनकी बात समझ नहीं आती क्योंकि वहाँ की गतिविधियों में प्रविष्ट हुए बिना हम उन्हें नहीं समझ सकते, वे हमें पागल से लगते हैं लेकिन वे हमारी दुनिया से होकर गए हैं इसलिए वे दोनों दुनिया को भलीभाँति जानते-समझते हैं। हम 'स्व' को बढ़ाने में लगे हैं, वे 'स्व' को मिटाने में लगे हैं। चूंकि हम बचपन से अभ्यस्त हैं इसलिए अहंकार के बिना जीना हमारे लिए बहुत कठिन है, वे अहंकार दूर करने की कठिनता को सरल बनाने में लगे हैं, अपने लिए और दूसरों के लिए भी। हम काम के बदले आराम की खोज में रहते हैं लेकिन उनके जीवन में आराम शब्द है ही नहीं, वे निरंतर काम करते हैं, स्व को छोड़कर सर्वजनहिताय।
सद्गुरु जग्गी वासुदेव से मैं उस समय से नाराज़ चल रहा हूँ, जब से हमारा बेटा कुंतल उनके आश्रम से सम्बद्ध हो गया, आज भी मैं उनसे रुष्ट हूँ। आश्चर्य होगा आपको कि मैं कुंतल से नाराज नहीं हूँ क्योंकि हर मनुष्य को अपने जीवन की राह चुनने की स्वतन्त्रता है, उसे भी थी। देर-सबेर सही, हमने भी उनके निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी और अपने मन को समझा-बुझा कर उनके निर्णय को अपने अनुकूल कर लिया लेकिन आध्यात्म की राह अपना कर कुंतल अपने अपनों से दूर हो गया। यह ऐसी पीड़ा है जिसे हम निरंतर सह रहे हैं, संभवतः कुंतल हमारी पीड़ा को समझते होंगे। यह सही है कि उनकी नज़दीकी असंख्य लोगों से हो गयी लेकिन हमसे उनकी एक दृश्य दूरी बन गयी। हम भी उन असंख्य लोगों की भीड़ में से एक हैं जिनसे आज उनकी नज़दीकी है। आध्यात्म के मार्ग में पारिवारिक मोह-माया बाधा है, यह हमें मालूम है, लेकिन आध्यात्म हमारे पारिवारिक तानेबाने के मार्ग में क्यों बाधा बन गया, यह अफसोस हर समय मेरे मन में बना रहता है। इसका दोष मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव पर मढ़ता हूँ क्योंकि उनके चुम्बकीय आकर्षण के सामने हमारा दुनियावी आकर्षण कमजोर पड़ गया। जो जादुई संसार हमने कुंतल के जीवन के इक्कीस वर्षों में रचा, वह सहसा धाराशायी हो गया और हम गुजरते कारवां को देखते रह गए !
मैं आश्रम इसलिए जाता हूँ ताकि इन बूढ़ी आंखो से अपने पुत्र को जी भर कर देख सकूँ, उसकी मीठी आवाज़ को अपने कानों से सुन सकूँ और यह सुनिश्चित कर सकूँ कि वह आश्रम का कार्य ठीक से कर रहा है या नहीं?
शुरुआत में जब मैं आश्रम गया था, वहां पर तमिल का बोलबाला था और अंग्रेजी का. हिंदी भाषा न कोई बोलता था और न समझता था. वैसे, मैंने तमिलनाडु में हिंदी बोलने के लिए दुराग्रह देखा लेकिन आश्रम में तो उत्तर भारत के लोग भी पहुंचते हैं, उनको होने वाली असुविधा पर वे लोग ध्यान नहीं देते थे. इसी वजह से हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग आश्रम से परिचित नहीं थे और सद्गुरु का नाम केवल दक्षिण भारत में जाना जाता था.
सन 2007 में आश्रम में एक सात दिवसीय कार्यक्रम हुआ था, 'होलनेस प्रोग्राम' जिसमें भाग लेने के लिए हम पति-पत्नी गए थे. कार्यक्रम की संपूर्ण प्रस्तुति अंग्रेजी भाषा में थी. मेरी अंग्रेजी ठीक-ठाक है लेकिन माधुरी की अंग्रेजी 'जीरो'. उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन दूसरे प्रतिभागी जैसा कर रहे थे उसे देखकर वे भी अभ्यास कर रही थी. प्रतिदिन सद्गुरु के दो से तीन घंटे प्रवचन हुआ करते थे वह उनके सिर के ऊपर से निकल रहा था, बहुत बेचैन थी. एक प्रश्नोत्तर सत्र में मैंने खड़े होकर कहा, 'यहां पर कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें अंग्रेजी समझ में नहीं आती, अच्छा होगा यदि जो बात कही जाती है उसका संक्षिप्त में ही सही, हिंदी अनुवाद कर दिया जाए.'
'कार्यक्रम के विवरण में यह स्पष्ट लिख दिया गया था कि इसका माध्यम अंग्रेजी होगा, अब यह शिकायत कैसी? मुझे हिंदी नहीं आती, मैं अंग्रेजी के अलावा तमिल, कन्नड़, मलयालम और तेलुगु भाषाएं जानता हूं, आप कहें तो इन भाषाओं में बोल सकता हूं.' सद्गुरु ने अंग्रेजी में उत्तर दिया. मैं चुप होकर बैठ गया, परंतु उस दिन मैंने आश्रम में हिंदी का बीज बो दिया.
जैसा होना होता है, वैसी परिस्थितियां बन जाया करती हैं. आश्रम में कुंतल का काम पूरे भारत में घूम-घूम कर 'इनर इंजीनियरिंग' की क्लास लेना चल रहा था. अचानक उसे 'डेंगू' बुखार हो गया. कोयम्बत्तुर के एक अस्पताल में वह बहुत दिनों तक वह भर्ती रहा. स्वस्थ होने के बाद उसको आश्रम से बाहर भेजना बंद कर दिया गया और 'पब्लिकेशन' विभाग में काम दे दिया गया. उनके साथ बिहार से आए एक और स्वामी भी थे, स्वामी चित्ता. इन दोनों ने आपसी चर्चा में यह तय किया कि सद्गुरु के यू-ट्यूब पर उपलब्ध प्रवचनों को हिंदी भाषा में 'डब' करके तैयार किया जाए. इसके लिए सद्गुरु की अनुमति आवश्यक थी, उन्होंने डरते-डरते उनसे पूछा तो वे बोले, 'कुछ डबिंग करके मुझे बताओ.' उन दोनों ने कुछ प्रवचनों का हिंदी अनुवाद किया और डबिंग करके सद्गुरु को सुनाया. कुछ सुधारों के बाद उन्होंने उसकी अनुमति दे दी. जैसे ही हिंदी अनुवाद यू-ट्यूब पर आया, धूम हो गई. उसके बाद बड़ी संख्या में उत्तर भारत में सद्गुरु का नाम पहुंच गया और उन्हें अखिल भारतीय लोकप्रियता प्राप्त हो गई. अब आश्रम में सर्वाधिक संख्या हिंदी बोलने वालों की दिखाई पड़ती है. सन 2007 मैंने जो बीज बोया था, उसकी फसल अब लहलहाने लगी है. मेरा अनुमान है कि हिंदी का महत्व सद्गुरु को समझ में आ गया होगा. एक उल्लेखनीय बात यह है कि सद्गुरु के 'लाइव' अंग्रेजी प्रवचनों का त्वरित अनुवाद कुंतल करते हैं. इस कार्य को वे इस खूबी से करते हैं कि ऐसा लगता है जैसे सद्गुरु हिंदी भाषा में ही बोल रहे हैं, आवाज कुंतल (स्वामी ऋजुडा) की होती है.
आश्रम का जीवन बहुत कठिन है. सुबह तीन बजे उठना, नित्यकर्म के पश्चात गुरुपूजा, फिर घंटों लंबी साधना और उसके बाद सौंपे गए कार्य का निष्पादन, फिर भोजन, तद्पश्चात पुनः कार्य से जुड़ना, रात्रि दस बजे शयन. बीच-बीच में कई दिनों के लिए 'साइलेंस'. एक मिनट की फुर्सत नहीं. घर-परिवार के लोग कभी-कभार मिलने पहुंचे तो उनसे भी बातचीत के लिए समय की बेहद कमी. आम तौर पर लोग सोचते हैं कि आश्रम का जीवन मज़े की ज़िंदगी है, संयास ले लिया, घर की जिम्मेदारी छोड़कर भाग गए लेकिन हमारा पुत्र विगत तेइस वर्षों से आश्रम में है, मैंंने प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया कि वे लोग वहां अपूर्व श्रम करते हैं, इतना अधिक कि हम सांसरिक लोग उस लगन और परिश्रम की कल्पना तक नहीं कर सकते. क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है, इन सब बातों के लिए उनका 'फोकस' इतना स्पष्ट रहता है कि उसे जानकर आश्चर्य होता है और खुशी भी. 'कारपोरेट सेक्टर' में होने वाले कामगार की तरह उनकी मानसिक तैयारी होती है और वहां के स्वामी उसी शैली में पूरी निष्ठा से, और, बिना किसी प्रतिफल के अपना सब कुछ अर्पण करते हैं. अद्भुत है उनके निःशुल्क सेवाभाव को देखना और समझना.
एक बात वहां और देखने में आई, जितने स्वामी हैं वहां, सब ऊंची 'डिग्री होल्डर'. उनमें से कई तो लाखों की सैलरी छोड़कर आश्रम में आए हैं. उन सब के मन में कुछ बहुत अच्छा कर गुजरने की तमन्ना देखी मैंने. वे जनसमूह में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के उन्नयन के लिए लगातार प्रयासरत है. वे संसार में ऐसे लोगों को तैयार करना चाहते हैं जिनमें सकारात्मक सोच हो, जीवन जीने का उत्साह हो तथा अपना जीवन दूसरों के कल्याण के लिए अर्पित करने का भाव हो. ईशा आश्रम का संचालन स्व-चलित शैली में होता है, सच पूछें तो वहां कोई प्रबंधक दिखाई नहीं पड़ता लेकिन सभी कार्य सुव्यवस्थित होते हैं. जो लोग वहां पर तैनात हैं, वे पूरे मनोयोग से, खुशी के साथ, बिना किसी अपेक्षा के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए लगे हुए हैं. सबसे बड़ी बात है, इतने अधिक लोगों का समूह वहां पर रहता है लेकिन पूर्ण शांति के साथ, कोई आवाज़ नहीं, कोई शोर नहीं. सदगुरु जग्गी वासुदेव साल में आधा समय आश्रम से बाहर रहते हैं लेकिन मानसिक रूप से वे हर समय उपस्थित रहते हैं.
मैंने कुंतल से पूछा, 'सद्गुरु के बाद कौन?'
'सदगुरु के बाद ध्यानलिंग.' उसने उत्तर दिया.
एक बात मुझे अवश्य खटकती है कि कुंतल ने अपना संसार तो व्यापक कर लिया लेकिन हमारे संसार को और छोटा कर दिया. जब हमारे बच्चे किशोरावस्था में थे तब हम पति-पत्नी ने यह निर्णय लिया था कि हम अपने बच्चों को उनके मन के अनुसार उन्हें विकसित होने का अवसर देंगे. कुंतल के विवाह के बाद केवल एक बार बहू को अपने घर में रखेंगे और अगली बार जब वो मायके से यहां आएगी तो उनके लिए अलग घर की व्यवस्था बनाकर देंगे ताकि हम सब के बीच प्रेम-व्यवहार बना रहे. परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि न कुंतल का विवाह हुआ, न हम लोगों को अपनी बहू का चेहरा देखने को मिला, न पोते-पोती को गोद में खिलाने का आनंद प्राप्त हुआ. उसने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और आश्रम की गोद में चला गया.
आश्रम का नियम-संयम ऐसा है कि उसे अपने परिवार से दूरी बनाकर रखनी है, वह अपनी तरफ से दूरी बनाने की पूरी कोशिश करता है लेकिन हम लोग उससे दूरी नहीं बना सके. उसको दुविधा में डालते रहते हैं, साल में दो-तीन बार उससे मिलने का कार्यक्रम बनाते हैं, जहां पर वह उपलब्ध होता है वहां चले जाते हैं और कुछ देर के लिए सही, उसे उसके परिवार की याद दिला कर खुश हो लेते हैं. जब भी वह मिलता है, बड़े आदर के साथ मिलता है, प्रेम से घर-परिवार-दोस्त और बिलासपुर की बातें करता है, विदा करते समय भूमि में मस्तक रखकर प्रणाम करता है.
पिछली बार उसने हमें प्रस्ताव किया था, 'आप लोग वहां का काम समेट कर यहां आश्रम में आ जाएं, यहां रहें. आप लोगों की पूरी व्यवस्था हो जाएगी.' हम दोनों ने मुस्कुरा कर रह गए. दरअसल जिस प्रकार उसे आश्रम भाता है, उसी प्रकार हमें अपना घर भाता है और अपना यह संसार. वह वहां खुश, हम यहां खुश.
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(10)
व्यापार का अर्थ है, अपना माल या अपनी सेवाएं बेचना. व्यापार न तो सरल होता है, न कठिन, हमारी उस काम में रुचि की मात्रा उसे सरल या कठिन बना देती है. व्यापार करना सायकिल चलाने जैसी क्रिया है, पायडल जैसा चलाएंगे वैसी सायकिल चलेगी, तेज या धीमी, और पायडल चलाना रुका और सायकिल रुकी. यह अपने-आप बहुत दिनों तक नहीं चलता, इसे लगातार आगे बढ़ाना होता है. व्यापार में सफलता मिल सकती है और नहीं भी. बहुत से कारक होते हैं, सबसे मुख्य होता है, ग्राहक की जरूरत को समझना. उसके बाद आती है सामान या सेवा की गुणवत्ता, फिर आपके बात-व्यवहार का तरीका. इन तीन बातों का सम्मिश्रण यदि है तो सफलता की संभावना अधिक हो जाती है. अपना सामान या सेवा बेचने के लिए ग्राहक की नाक में एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ाना पड़ता है जिससे ग्राहक के मन उसके लिए भूख जैसी जागृत हो जाए. जब ग्राहक आपकी ओर आकर्षित होगा तब वह आपका ग्राहक बनेगा. मरुस्थल में प्यास से तड़प रहे मनुष्य के सामने पानी का गिलास बेशकीमती होता है, इसी प्रकार अपने सामान या सेवा के बारे में बताकर ग्राहक की मानसिक भूख को जगाना ही व्यापार का मुख्य सूत्र है.
कई दूकानदार अपना सामान बेचने के लिए ग्राहक पर दबाव डालते हैं, सलाह पे सलाह पेलते हैं, इस तरह की तानाशाही किसी को भी पसंद नहीं आती. मर्जी उसकी चलती है जिसके जेब में पैसे होते हैं. आपको अपना माल या सेवाएं बेचना है इससे ग्राहक को कोई मतलब नहीं होता, वह अपनी जरूरत के मुताबिक खरीदी करता है. व्यापारी को इस बात को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि खरीदने का उद्देश्य ग्राहक में निहित है, माल या सेवा में नहीं. 'मैं'और 'मेरा' ये दो शब्द विक्रय कला में बहुत बड़ी बाधा होती है, 'आप' और 'आपका', ये दो शब्द बेशकीमती हैं. विक्रय कला को जानने का असली रहस्य मनुष्य के स्वभाव को समझने में है.
दस साल की उम्र से मैं व्यापार से जुड़ा. बारह साल तक मिठाई बेचा, उसके बाद सात महीने वकालत की, वकालत मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं थी इसलिए उसे त्याग कर फिर से मिठाई बेचने लगा. पंद्रह साल की लंबी पारी खेलने के पश्चात मैंने टेलीविजन और फर्नीचर पंद्रह साल तक बेचा, इस बीच व्यक्तित्व विकास और मानव व्यवहार के प्रशिक्षक के रूप में प्रशिक्षण देने का भी व्यवसाय भी किया. विगत छब्बीस वर्षों से लॉज चला रहा हूं, मतलब जिंदगी का अधिकांश हिस्सा व्यापार करने में लगा दिया. वकालत को छोड़ दें तो जिस काम को किया, पूरा दिल लगाकर किया और उन सब में पर्याप्त सफलता मिली.
इन दिनों बिलासपुर के सदर बाजार में श्री जगदीश लॉज चला रहा हूं. मज़े का काम है, मालिक की भूमिका केवल देखरेख की होती है, बाकी काम स्टाफ देखता और करता है. हमारी लॉज की लोकेशन अच्छी है इसका लाभ मिलता है लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने के कारण नुकसान भी होता है. नुकसान के कुछ और इंतज़ाम भी हमने कर रखे हैं, जैसे रिसेप्शन में बोर्ड में लिख रखा है, 'जोड़े में आने वालों का रिश्ता पति-पत्नी या भाई-बहन का होना चाहिए, अन्य रिश्ते मान्य नहीं हैं', अब बताइये, आज की परिस्थिति में यदि कोई होटल इस नियम का कड़ाई से पालन करेगा तो उसका होटल कैसे चलेगा? रोज बिना नागा अनेक जोड़े अपने मनोरंजन के लिए आते हैं, अधिक से अधिक एक घंटा रुकते हैं और पूरे एक दिन का किराया देकर चले जाते हैं. अब, हमने इस पर 'बैन' लगा रखा है तो कैसे कमाई होगी? एक और बात, 'यदि आप पीने-पिलाने के शौकीन हैं तो किसी दूसरे होटल में चले जाइए, यह लॉज आपके लायक नहीं है', अब, आज के युग में ऐसा नियम लागू है तो बहुत बड़ी संख्या में ग्राहक होटल आने से बिदक जाएंगे. धंधा करने बठे हैं तो ग्राहक की जरूरत को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए लेकिन हमारे यहां तो उल्टी गंगा बह रही है! लेकिन चाहे जो भी नुकसान उठाना पड़े, हम इन दोनों नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं. इनकी वज़ह से एक फायदा हमें होता है, परिवार के साथ आने वाले ग्राहकों के लिए हमारा लॉज उनकी प्राथमिकता में होता है और उन्हें हमारे लॉज में सुरक्षा और शांति का अनुभूति होती है. दाल-रोटी अच्छी चल रही है, साथ में एक छोटी चम्मच घी भी मिल जाता है.
व्यापार में एक खास बात होती है कि कभी अच्छा चलता है तो कभी कमजोर, कभी खुशी तो कभी गम. स्टाफ का वेतन, बिजली की खपत और रख-रखाव का खर्च यथावत चलता रहता है, ग्राहक आए. न आए. व्यापारियों में एक बात कही जाती है, 'मौत और ग्राहक के आने का कोई भरोसा नहीं'. मौत का खेल तो किसी को समझ में नहीं आता लेकिन ग्राहकों का कम आना दूकानदार के लिए चिंता का विषय होता है. कई दूकानदार अपनी दूकान के सामने नीबू-हरी मिर्च लटकाते हैं लेकिन यह टोटका भी काम नहीं करता, तब चिंता और बढ़ जाती है परंतु ग्राहक पर दूकानदार का जोर नहीं चलता. उसको जब आना होगा तब आएगा, मेरे एक मित्र सुधीर खंडेलवाल की दूकान में जब ग्राहक नहीं आते थे तो वे मेरी दूकान मधु छाया केंद्र, जो उनकी दूकान के सामने थी, में आकर बैठ जाया करते थे और फिल्म 'सोहनी महिवाल' का यह गाना गुनगुनाया करते थे, 'आने वाले को आना होगा...'. नौकरी पेशा में यह सुविधा रहती है कि कैसी भी स्थिति हो, हर महीने का वेतन पूरा मिलेगा लेकिन व्यापार में ऐसा नहीं होता. दूकान में ग्राहक आए तो आए, नहीं आए तो नहीं आए. व्यापार चला तो चला, नहीं चला तो नहीं चला. सफलता के किस्से हर जगह सुनाए-बताए जाते हैं लेकिन असफलता की बातें कोई नहीं बताता जबकि सफल लोगों के मुकाबले असफल की गिनती अधिक होती है. कितनी दूकानें और कारखाने न चल पाने के कारण बंद हो जाते हैं, लोग घाटे में पड़ जाते हैं, इसकी चर्चा नहीं होती जबकि उनकी असफलताएं के कारणों पर भी गौर किया जाना चाहिए.
बचपन से अब तक व्यापार किया, नौकरी कभी नहीं की. व्यापार मेरे खून में पुस्तैनी है. एक बात का मैंने अनुभव किया कि व्यापारी का बच्चा यदि सच्चाई और ईमानदारी का दामन थाम ले तो उसके सफल होने की संभावना अधिक हो जाती है. झूठ, बेइमानी, धोखाधड़ी से फौरी तौर कुछ फायदा दिखाई दे सकता है लेकिन वैसे घोड़े लंबी रेस के नहीं होते.
अखबारों और फेसबुक के अधिकतर विज्ञापन भ्रमित करने वाले होते हैं, जो लिखा जाता है वैसा असल में नहीं मिलता, कुछ और ही होता है. ग्राहक किसी प्रकार उनकी पकड़ में आ जाए, उसके बाद वह उनका हो जाता है, घुमा-फिराकर अपनी बातें उसको समझा देंगे और माल बिक जाएगा किंतु सिर्फ एक बार. जब ग्राहक को अपने ठगे जाने का अहसास होता है तब वह दोबारा उस दूकान में पैर नहीं रखता लेकिन वह किसी नई ठिकाने में ठगाने के लिए फिर से मजबूर हो जाता है. ग्राहकों की मोलभाव करके कीमत कम करवाने की प्रवृत्ति का दोहन आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है. एम.आर.पी. ज्यादा और बेचने की कीमत कम बताकर उसे दिग्भ्रमित किया जाता है और ग्राहक मूर्ख बनकर खुशी-खुशी पैसे देकर सामान खरीद लेता है. 'एक पर एक फ्री' और 'एक्स्चेंज' ऑफर में इतना बड़ा धोखा है कि ग्राहक को समझ में नहीं आता, दूकानदार खुश और ग्राहक भी खुश.
व्यापार में घपलेबाजी का एक सच्चा किस्सा बताता हूं, बिलासपुर के मध्य में एक थाना है, सबसे पुराना थाना जिसका नाम है सिटी कोतवाली. उसके सामने है बिलासपुर म्युनिस्पाल्टी का स्कूल म्युनिस्पल स्कूल जिसका नाम शास्त्री जी के निधन के बाद लालबहादुर शास्त्री स्कूल हो गया है. यह बात 70 साल पुरानी है, म्युनिस्पल स्कूल की विपरीत दिशा में, थाने के सामने एक मज़मेबाज जिसका नाम दरयाव खान था, जमीन पर बोरा बिछा कर मज़मा दिखाया करता था. मज़मेंबाज़ का मतलब है, छोटी-मोटी जादूगरी दिखाने वाला इंसान जो बच्चों के लिए मज़ेदार करतब दिखाने वाला. शहर में तीन-चार और मज़मेबाज थे जो सब दरयाव खान को अपना गुरू मानते थे और उसे 'गुरू दक्षिणा' भी दिया करते थे. भारत विभाजन के बाद सन 1948 में पाकिस्तान से भारत आकर बिलासपुर में टिक गया और मज़मा दिखा कर अपना परिवार चलाता था. दरयाव खान के साथ पाकिस्तान से मोतीराम सिंधी भी आया था, दोनों के बीच इसीलिए दोस्ती भी थी. मोतीराम ने गोलबाज़ार में किराने की दूकान खोली जिसका नाम था, मोतीराम आनंद राम.
एक दिन की बात है दरयाव खान अपने पुराने परिचित मोतीराम की दूकान में पहुंचा और उससे कहा, 'मेरे पास एक ऐसी दवा है जो दाद-खाज में बहुत अच्छा काम करती है. इसे तुम अपनी दूकान में रखकर बेचो, मुझे बिक जाने के बाद के बाद पैसे देना.' यह कहकर 12 डिब्बी दिया और चला गया. चार आने में एक डिब्बी बेचना था, एक डिब्बी में एक आने का फायदा मिलने वाला था. 12 डिब्बी चार दिन में बिक गई. उसके बाद जो उस दवा के ग्राहक आते थे, लौट जाते थे. मोतीराम ने पुराना पैसा दिया और 12 डिब्बी फिर उधार में ले गया. एक सप्ताह में वह भी बिक गई. दरयाव खान की दवा बेचकर मोतीराम बहुत खुश था क्योंकि उसे उधार में माल मिल रहा था और मुनाफा भी अच्छा हो रहा था. अगली बार दरयाव खान 12 दर्जन डिब्बी लेकर उसकी दूकान में पहुंचा और बोला, 'मैं दो महीने के लिए बाहर जा रहा हूं, इतनी डिब्बियां रख लो क्योंकि ग्राहक लौटना नहीं चाहिए परंतु इस बार इसका पैसा तुम्हें अभी देना होगा, मैं बाहर जा रहा हूं, मुझे पैसे की ज़रूरत होगी.' मोतीराम हिचकिचाया लेकिन दवा की बिक्री अच्छी थी और मुनाफा भी भरपूर हो रहा था, उसने पूरा पेमेंट कर दिया. दरयाव खान ने पैसे गिनकर लिए, अपनी जेब में रखा और चला गया.
मोतीराम ने देखा कि दवा का कोई ग्राहक नहीं आ रहा है, उसे चिंता हुई लेकिन दरयाव खान उसे सिटी कोतवाली के पास दिखा ही नहीं. एक दिन रास्ते में जब दरयाव खान मिला तो मोतीराम ने कहा, 'तुम्हारी दवा की एक डिब्बी तक नहीं बिकी. अपनी दवा वापस ले जाओ और मेरा पैसा वापस करो.' दरयाव खान ने कहा, 'मेरा उसूल है कि मैं बिका हुआ माल वापस नहीं लेता.' और वहां से रफूचक्कर हो गया.
एक परिचित ने दरयाव खान से पूछा, 'मोतीराम तुम्हारे नाम पर रो रहा था! तुमने क्या किया, उसका माल वापस क्यों नहीं ले रहे हो?' दरयाव खान ठहाका मार कर हंसा और बताया, 'वह दवा नहीं, ग्रीस भरी थी, डिब्बियों में.'
'और, शुरू में बिक्री अच्छी हुई, बाद में ग्राहक आना क्यों बंद हो गए?'
'मैं अपने ही आदमियों को ग्राहक बनाकर उसकी दूकान में भेजा करता था.'
'कहिए?' मैंने पूछा।
'हमारी कंपनी हर महीने हमें 'बिजनेस टार्गेट' देती है जिसे 'अचीव' करना बहुत कठिन रहता है।'
'काम तो करना पड़ेगा, तब तो तनख्वाह मिलेगी।'
'वह बात नहीं है सर, हमें तनख्वाह और 'कमीशन' दोनों मिलता है।'
'अरे वाह, फिर क्या समस्या है ?'
'हमारी कंपनी की ब्याज दर अन्य कंपनियों और बैंकों के मुक़ाबले अधिक है, ग्राहक को समझाने में बहुत मुश्किल होती है।'
'फिर?'
'हमारा टार्गेट इतना अधिक रहता है कि छोटे-मोटे 'केसेज़' तो हम लोग छूते नहीं, 'जेबीसी', ट्रक या ट्रेक्टर वालों को पकड़ते हैं।'
'ठीक है, फिर ग्राहक को कैसे समझाते हो ?'
'सर, ग्राहक को बताने के लिए हमने कुछ अन्य कंपनियों और बैंको के 'बोगस फोल्डर' तैयार करवा लिए हैं जिनमें उनकी ब्याज दर से हमारी ब्याज दर से अधिक प्रिंट करवा ली है और उसे दिखाकर ग्राहक को समझाते हैं कि हमारे 'रेट' दूसरों से कम है।'
'ये तो बेईमानी है।'
'क्या करें, बिजनेस के लिए करना पड़ता है।'
'कल के दिन ग्राहक को मालूम पड़ा तो ?'
'पड़ता रहे, हमें बिजनेस मिल गया, फायनेंस हो गया, उसके बाद ग्राहक हमारा क्या बिगाड़ेगा ?'
'धोखाधड़ी की शिकायत कर सकता है।'
'ऐसे कैसे करेगा ? बैंक वाला फोल्डर उसको दिखाते भर हैं, देते कभी नहीं।'
'ओह, तो आपको परेशानी क्या है ?'
'बहुत दिल दुखता है सर, आत्मा धिक्कारती है, रात को नींद नहीं आती।'
'फिर'?
'आप बताइए सर, क्या करूँ ?'
'आत्मा धिक्कार रही है तो यह काम छोड़ दीजिए, कुछ और कीजिए।'
'अच्छी सलाह दे रहे हैं आप, ऐसे में मैं भूखे मर जाऊंगा !'
'ईमानदारी से काम करने वाला भूखा नहीं मरता, मेरे भाई।'
'कैसा करूँ ?'
'अपनी आत्मा और अपनी बुद्धि में वार्तालाप चलने दीजिए, कुछ-न-कुछ निष्कर्ष निकलेगा।' मैंने कहा।
दिल्ली में मेरे
एक फेसबुक मित्र हैं, श्री अरविंद पथिक, उन्होंने मुझसे
आत्मकथा को पुस्तक के रूप में लाने पर बहुत जोर दिया. उनका मानना था कि कि ब्लॉग
को कम लोग पढ़ते हैं, पुस्तक के पाठक अधिक होते हैं.
न-नुकुर करते-करते अंततः मैंने अपना मन बनाया और
पता लगाने की
कोशिश की कि पुस्तक कैसे प्रकाशित होगी? सबसे पहले
ज्ञानपीठ और वाणी प्रकाशन का नाम सामने आया लेकिन वहां की प्रक्रिया लंबी और
अनिश्चित समझ में आई तो डायमंड बुक्स से बात करने का विचार किया. डायमंड का
ए.एच.व्हीलर से गठबंधन था और देश भर में संचालित बुक स्टोर्स से उनके व्यापारिक
सम्बंध ज्ञात हुए इसलिए वहां से पुस्तक प्रकाशित करवाने का निर्णय लिया. मैंने इस
संबंध में अरर्विंदजी से बात की तो उन्होंने कहा, 'दिल्ली आ जाइए, मेरे एक परिचित
हैं उनके डायमंड से अच्छा संपर्क है, उनके माध्यम से
आपका काम आसानी से हो जाएगा.' मैं दिल्ली पहुंच गया.
हम लोग उन्ही की
कार में डायमंड प्रेस पहुंचे, वहां के मालिक नरेंद्र कुमार वर्मा
से मुलाकात हुई. उन्होंने पुस्तक छापने का मूल्य पचास हजार रुपए बताया और कहा कि
एक हजार प्रतियां छपेंगी, तीन सौ मुझे देंगे, शेष उनकी होगी.
एक अनुबंध में हस्ताक्षर करवाए जिसमें इस बात का भी ज़िक्र था कि एक हजार प्रतिया
बिक जाने पर वे मुझे 12% रायल्टी देंगे. मैंने प्रकाशक को
चेक दे दिया. उसके बाद जो सज्जन हमें साथ लेकर गए थे उन्होंने हम दोनों को केबिन
से बाहर का रास्ता बता दिया और बोले, 'मुझे जरा निजी
बात करनी है.' हम लोग बाहर हो गए. मैं विस्मित हो गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया लेकिन बात
आई-गई हो गई.
वहां से वे हम लोगों को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ले गए जहां दिल्ली का अभिजात्य वर्ग गोल-टेबल के इर्द-गिर्द बैठकर शराब-नोशी करते हुए बातचीत में मशगूल था. कुछ हस्तियों से उन्होंने मेरा बहुत बड़े साहित्यकार के रूप में परिचय कराया, मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि जिस व्यक्ति की अभी तक एक किताब प्रकाशित नहीं हुई है, वह 'बड़ा साहित्यकार' कैसे हो गया? बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि दिल्ली के किसी बड़े सभागार में कुछ नामचीन साहित्यकारों के करकमलों से वे मेरी पुस्तक का विमोचन और परिचर्चा आयोजित करेंगे और 'देखना आप, आपकी और आपकी पुस्तक की चर्चा पूरे देश में होने लगेगी.' उनकी बातें सुनकर मुझे प्रसन्न होना चाहिए था लेकिन मेरे कान चौकन्ने हो गए. मैं उनसे छुटकारा पाकर बिलासपुर लौट आया.
एक माह बाद पुस्तक छ्प कर मेरे पास आ गई. अपनी पहली पुस्तक देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. बढ़िया कवर पेज, अच्छी और दोषरहित छपाई ने आनंद द्विगुणित कर दिया. यह आनंद तीन गुना तब हो गया जब इसकी बिक्री अमेज़ान में तेजी से बढ़ी. यह पुस्तक फिल्म 'जय संतोषी माता' की तरह हिट हो गई. तीन साल बीत गए, फिर भी प्रकाशक की ओर से रायल्टी की कोई खबर नहीं आई तो मैंने उन्हें ई.मेल पर लिखा कि वे बताएं कि कितनी पुस्तकें बिकी और कितनी स्टाक में हैं. उनका उत्तर आया, 'यह बताना हमारी पालिसी में नहीं है.' किताब को प्रकाशित हुए तेरह साल हो गए हैं, आज तक एक रुपया भी मुझे रायल्टी प्राप्त नहीं हुई. डायमंड के मालिक आदरणीय नरेंद्र कुमार वर्मा इस बीच इस असार संसार से मुक्त होकर ऊपर चले गए, अब किससे और क्या शिकायत करें? जय श्री राम.
इस बीच मेरी आत्मकथा का दूसरा खंड लिख कर तैयार हो गया था. मेरे एक जयपुरिया मित्र ने मुझे जयपुर के बोधि प्रकाशन से उसे प्रकाशित करवाने का सुझाव दिया. मैंने प्रकाशन के मालिक श्री माया मृग से फोन पर बात की, उन्होंने पाण्डुलिपि मंगवाई, मैंने भेज दी. उन्होंने पढ़कर अपनी सहमति दी और बीस हजार रुपए की मांग की, मैंने चेक भेज दिया. कवर पेज के लिए मैंने छिंदवाड़ा के रोहित रूसिया द्वारा बनाया गया एक रेखा चित्र पसंद किया, वे भी मान गए. पुस्तक छप कर आ गई. तब मेरी बनिया बुद्धि को तब समझ में आया, 'द्वारिका, दिल्ली वाले प्रकाशक ने तीस हजार रुपए अधिक लेकर तुम्हें ठग लिया.' खैर जो उसने किया, सो किया लेकिन अनुबंध के अनुसार उसे रायल्टी तो देना था, वह उसे भी डकार गया. वह चालाक निकला और मैं निरा बुद्धू. मेरे पिता कहा करते थे कि कई बार जानबूझ कर बुद्धू बन जाना फायदे का सौदा होता है. मुझे इस प्रकरण से यह फायदा हुआ कि मैं यह समझ गया कि मैं बुद्धू बनने के लिए ही इस संसार में आया हूं.
एक साल में तीसरा खंड तैयार हो गया. इस बार फिर से बोधि प्रकाशन को छापने के लिए दिया, पंद्रह हजार रुपए लगे. उसके अगले साल संस्मरण-कथा संग्रह 'याद किया दिल ने' वहीं से छपा. खुशी की बात यह थी कि उस समय तक मेरी पुस्तकों की बहुत अच्छी बिक्री होने लग गई थी संभवतः इसलिए प्रकाशक जी ने रुपया लिए बिना मेरी पुस्तक प्रकाशित कर दी. आठ पुस्तकें और भी प्रकाशित हुई, विभिन्न प्रकाशकों यथा, रश्मि प्रकाशन (लखनऊ), वैभव प्रकाशन (रायपुर) और भावना प्रकाशन (नई दिल्ली) से, सबने केवल मुस्कुराहट की कीमत पर मेरी पुस्तकें प्रकाशित की.
चूंकि बात पुस्तकों की चली इसलिए यहां पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मेरा लिखना कब और कैसे शुरू हुआ?
अब्राहम मास्लो ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है, मनुष्य की जरूरतों के बारे में, एक त्रिभुज के आधार पर उसने अपनी बात समझाई है. त्रिभुज में तीन कोण होते हैं, नीचे चौड़ा और ऊपर संकरा. नीचे चौड़ा का भावार्थ है, अधिकतर लोग और ऊपर संकरा का भावार्थ, बहुत कम लोग. तो, नीचे से शुरू करते हैं, मनुष्य की सबसे पहली जरूरत है, रोटी और कपड़ा. जब रोटी और कपड़े की व्यवस्था हो जाती है, उसके बाद दूसरे चरण में सुरक्षा की बात आती है. घर हो जाता है, पशुओं और कीड़े-मकोड़ों से सुरक्षा हो जाती है तो मनुष्य खुद को सुरक्षित महसूस करने लगता है. सुरक्षा के पश्चात तीसरे चरण में उसके मन में चाहत होती है कि उसे समाज में पहचाना जाए. पहचान के लिए उसको समाज में मिलना-जुलना होता है, वह विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित होता है. विभिन्न समूहों या राजनीति में भाग लेता है. कुछ लिखना भी शुरू करता है ताकि उसके लेखन से लोग परिचित हों. इस प्रकार उसका परिचय का दायरा बढ़ता है. इस जरूरत के पूरे होने के बाद चौथे चरण में मान-सम्मान की इच्छा जागृत होती है. वह कुछ ऐसा अनोखा और अद्भुत कार्य करना चाहता है जिससे समाज में लोग उसे मान-सम्मान देंं. लेखन, कविता, नृत्य, संगीत, फोटोग्राफी, खेल-कूद आदि किसी क्षेत्र में अपने हुनर का प्रदर्शन करता है. जब ये चारों जरूरतें पूरी हो जाती हैं, उसकी सांसारिक जरूरतें पूरी हो जाती हैं तब उसे पाँचवे चरण में आत्मबोध होता है, मतलब, मैं कौन हूं, इस संसार में क्यों आया जैसे प्रश्न उसके दिमाग में उठने लगते हैं. इस जरूरत को पूरा करने के लिए वह गहन पठन-पाठन में संलग्न हो जाता है, उसका झुकाव आध्यात्म की ओर होने लगता है.
लेखन की शुरुआत तीसरे चरण में शुरू होती है, अर्थात जान-पहचान या परिचय के विस्तार से. जब वह दूसरों के द्वारा लिखे हुए लेख या कविता को पढ़ता है तो उसके मन में आता है कि मैं भी लिखूं. कुछ लोग इसमें सफल हो जाते हैं, कुछ लोगों से नहीं बन पाता. जिनसे बनता है, वे अपनी रचना सुनाकर या फेसबुक में पोस्ट करके या कहीं छपवा कर खुश हो जाते हैं. यहीं से उनका परिचय संसार बढ़ता है. धीरे-धीरे उनकी रचना में निखार आने लगता है और वे जरूरत के चौथे चरण में पहुंच जाते है, अर्थात, मान-सम्मान वाले खांचे में. तीसरे चरण में पहुंचने वाले अधिक होते हैं, चौथे चरण में पहुंचने वाले कम और पांचवे चरण में बहुत ही कम. मैंं चौथे चरण तक पहुंचने में सफल हो गया हूं.
मेरा लेखन 65 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ, उसके पहले मैं व्यापारी था, प्रशिक्षक था, उसके बाद लेखक बना. सामान्यतया लेखक अपनी आत्मकथा जीवन के अंतिम समय में लिखा करते हैं, मैंने अपना लेखन आत्मकथा लिखने से शुरू किया. लेखक को कुछ लिखने के पहले विषय की तलाश करनी होती है, फिर विचार की, उसके बाद शब्द की, शिल्प की. मेरे पास मेरे जीवन में घटी हुई घटनाओं का वृहद संसार था इसलिए विषयवस्तु की कमी नहीं थी, केवल उसे शब्द देने थे, उन्हें कालानुसार पिरोना था. शब्द और शिल्प की समस्या मेरे साथ नहीं थी क्योंकि पचीस वर्षों तक प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़े रहने के कारण उनका मेरे पास पर्याप्त भंडार था. मैं कोई पढ़ा-लिखा ट्रेनर नहीं था, बिजनेस मेनेजमेंट की डिग्री भी मेरे पास नहीं थी फिर भी जेसीज़ इंटरनेशनल के माध्यम से मैं इंटरनेशनल ट्रेनर बन गया था, इस वज़ह से प्रशिक्षण के क्षेत्र में मैं प्रविष्ट हो सका. व्यक्तित्व विकास और व्यवहार विज्ञान के विभिन्न विषयों का प्रशिक्षण मैंने करीब 25 वर्षों तक किया. शताधिक सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों, शिक्षण संस्थानों की कार्यशालाओं में हज़ारों लोगों को प्रशिक्षित करने का मुझे सुअवसर मिला.
प्रबंधन मनुष्य का हो या संगठन का, बहुत कठिन विषय है. मोटी-मोटी किताबों को अंग्रेजी भाषा में पढ़कर उसे समझना, फिर उन्हें हिंदी भाषा में अनूदित करना और उसके पश्चात आम बोलचाल की भाषा में प्रशिक्षुओं को बताना-समझाना मुझे अत्यंत रोचक लगा, मेरा उस कार्य में बहुत दिल लगा और मेरे काम और नाम की चर्चा हिंदीभाषी क्षेत्रों में फूलों की खुशबू की तरह फैलने लगी. उसके बाद 2003 में मेरे दाहिने गाल में कैंसर हुआ, सर्जरी हुई, 2008 में फिर से उसी गाल में कैंसर हुआ, अबकी बार ज़रा और बड़ी सर्जरी हुई, 2009 में बाएं गाल में कैंसर हो गया, उसकी भी सर्जरी हुई. इन तीन सर्जरी की वज़ह से मुझे बोलने में असुविधा होने लगी, उच्चारण में दोष आ गया इस कारण मैंने प्रशिक्षण देना बहुत कम कर दिया और बेचैन रहने लगा कि आगे का जीवन आखिर जियूं तो कैसे जियूं?
सन 2012 में मेरे हाथ लेपटाप लगा, मैं फेसबुक से जुड़ा तब मेरे इस लेखकीय जीवन की शुरुआत हो गई. प्रशिक्षण के दौरान मैंंने जो सीखा और सिखाया, वह मेरे लेखन की प्रक्रिया में बहुत काम आया. यदि आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि मेरे लेखन में वर्णित घटनाओं के अतिरिक्त वे बातें भी होती हैं जो प्रशिक्षण के दौरान मैंंने सीखी-सिखाई थी.
बचपन से प्रौढ़ावस्था तक मैंं संयुक्त परिवार से जुड़ा रहा, सक्रिय रूप से भागीदार रहा. इस पारिवारिक व्यवस्था ने मुझे खुशियाँ कम दी, कष्ट और दुख बहुत दिए. असल में उन परिस्थितियों का सामना मुझे स्वयं की गलतियों के कारण भुगतना पड़ा. संयुक्त परिवार में जो सदस्य बुद्धिमान या व्यवहारिक होते हैं वे फायदे में रहते हैं और जो भावुक होते हैं वे सताए जाते हैं. भावुकतावश वे अपना बड़ा जीवन काल परिवार के हित में होम कर देते हैं लेकिन कालांतर में परिवार से उन्हें शाबासी मिलने की जगह आलोचना और निराशा हाथ लगती है. स्वाभाविक है, जो परिवार में काम करता है उसे बिना उसकि अहमियत समझे सहज और स्वाभाविक मान लिया जाता है, उसका कोई खास महत्व नहीं होता. दरअसल, मेरी भावुक स्वभाव ने मुझे बहुत सताया.
हमारे आसपास लाखों संयुक्त परिवार हैं जिनमें ऐसा ही कुछ घटित हो रहा है. मैंने अपने जीवन की घटनाओं को सबके सामने खोल कर रख दिया ताकि उसे पढ़ कर लोग स्वयं मूल्यांकन करके देख सकें कि कहीं वे भी तो ऐसी स्थितियों के शिकार नहीं हो रहे हैं? यदि है तो उन्हें अभी सचेत हो जाना चाहिए और दूसरे विकल्प की तलाश करनी चाहिए. संयुक्त परिवार की विसंगतियों से पीड़ित इस इंसान ने अपने अनुभवों को वे शब्द दिए जो संयुक्त परिवारों से जुड़े हुए अधिकांश लोगों का दुख-दर्द है. हर व्यक्ति जो इस आत्मकथा को पढ़ता है, इसकी घटनाओं में खुद को तलाशता है और मुझसे पूछता है, 'मेरी कहानी आपको कैसे मालूम पड़ी ?''
मेरे उपन्यास 'मद्धम मद्धम' और 'परदेसी जाना नहीं' दोनों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है. 'मद्धम मद्धम' में एक निम्नवर्गीय परिवार में पल-बढ़ रही कन्या के संघर्ष की कहानी है जो अपने परिवार की समृद्धि के लिए कुछ करना चाहती है. जब अदालत में वह वकालत करने जाती है तो न्याय व्यवस्था के दोषों से उसका आमना-सामना होता है, उन दोषों को दूर करने के लिए वह जज बनने का लक्ष्य निर्धारित कर लेती है और उसे ईमानदारी से हासिल करने का प्रयास करती है. दूसरा उपन्यायास 'परदेसी जाना नहीं' देश विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आकर बस गए एक सिंधी परिवार की कथा है. माता-पिता दोनों वृद्ध हो गए हैं, रोगग्रस्त हैं लेकिन उनका बड़ा बेटा व्यापार करने के लिए दूसरे शहर में जाकर बस गया है और छोटा बेटा अमेरिका में पढ़-लिखकर वहीं नौकरी कर रहा है, उनकी देखरेख के लिए कोई नहीं है. यह समस्या इन दिनों भारत में आम है लेकिन इसका कोई उपाय नहीं दिखाई देता. बुजुर्ग अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और उनके बच्चे अपना रोजगार या नौकरी नहीं छोड़ सकते. इस उपन्यास में इस समस्या का एक समाधान खोजने की कोशिश की गई है जो नई पीढ़ी के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकती है.
कथा संग्रह 'याद किया दिल ने' और 'तेरी मेरी कहानी है' की विषयवस्तु मेरी देखी-सुनी-समझी हुई है. किशोरावस्था में हम लोग 'धर्मयुग' साप्ताहिक पत्रिका पढ़ा करते थे. उसी 'धर्मयुग' में मैंने कवयित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से प्रेरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं.
यात्रा करना मनुष्य का शौक माना जाता है जबकि यह अनिवार्यता भी होती है. शौक उनका है जो आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम है, दुनिया को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं. अनिवार्यता उनकी है जिन्हें मंदिर में प्रार्थना या मनौती करनी है, रिश्तेदारी या नौकरी पर जाना है, इलाज़ करवाना है, अपना माल बेचने के लिए दर-दर भटकना है. मेरे लिये यात्रा करना अपने जीवन के शेष रह गये काम को निपटाना है. जब घूमने-फिरने के दिन थे तब जेब खाली थी, अब जब मेरी जेब में ख़र्च करने के लिए कुछ है तो मेरे साठोत्तर शरीर की परेशानियां हाज़िर हैं. फिर भी, मैं उतना अशक्त नहीं कि चल-फिर न सकूं इसलिए जब भी शहर से बाहर निकलने का कोई अवसर मुझे मिलता है तो मैं ट्रेन में बाद में बैठता हूँ, उस जगह पर दिमागी तौर पर पहले ही पहुँच जाता हूँ. वैसे, सड़क या वायुमार्ग के बदले मुझे रेल की पटरियां अधिक पसंद हैं. रेल यात्रा में सिकुड़ कर बैठने की तकलीफ नहीं झेलनी पड़ती, दूसरे की छोड़ी हुई सांस को लेने की मज़बूरी नहीं होती, जब मन पड़े आराम से लेट जाओ, जब मन पड़े सामने बैठे अनजान व्यक्ति से बातें करो या चुपचाप उसे ताकते-निरखते रहो. जब भूख लगे, पास में रखा सामान निकालो और खा लो या किसी स्टेशन में उतरकर कुछ खरीद कर खा लो. बैठे-बैठे या सोते-सोते ऊब गए हों तो ट्रेन जहाँ खड़ी हो, डब्बे से उतर कर कमर सीधी कर लो या अपने पैरों को चलायमान कर लो. फिर, ट्रेन की टिकट सस्ती पड़ती हैं, हवाई मार्ग या सड़क मार्ग के मुकाबले 'पाकेट फ्रेंडली' होती हैं. इन सब कारणों से मुझे ट्रेन की यात्रा तुलनात्मक रूप से अधिक पसंद है.
'मुसाफिर..जाएगा कहाँ' और 'कहाँ ले चले हो..बता दो मुसाफिर' में विगत वर्षों की यात्राओं पर मेरे द्वारा लिखे गए कुछ संस्मरण हैं. इन यात्राओं में मेरी दृष्टि स्थूल पर कम थी, मानवीय व्यवहार पर अधिक. इन यात्राओं में मैंने अपने भारत को देखा, कुछ विदेशों की भी यात्रा की और जो कुछ देखने में आया उससे समझ में आया कि अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए घर से बाहर निकलना ज़रूरी है. बाहर की दुनिया देखने से दुनिया समझ में आती है.
मेरी कविता है :
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