गुरुवार, 10 सितंबर 2026

आत्मकथा : ज़िंदगी एक सफर है सुहाना

आत्मकथा : ज़िंदगी एक सफर है सुहाना 

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प्राक्कथन :

मैंने अपना लेखन आत्मकथा से शुरू किया था. मेरी आत्मकथा के तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं, 'न वो समझ सके न हम' (2013), 'पल पल ये पल' (2014) और 'दुनिया रंग बिरंगी' (2015). एक साधारण मनुष्य की जीवन यात्रा को जितना पढ़ा और सराहा गया, वह मेरी अपेक्षा से बहुत-बहुत ज्यादा रहा. पाठकों की प्रतिक्रिया को यदि एक साथ संकलित किया जाए तो एक पूरी पुस्तक बन जाएगी. उन प्रतिक्रियाओं में एक बात आम रही कि उन्हें मेरी कहानी अपनी कहानी जैसी लगी. परिवार में रहने और जीने की विवशता सबकी लगभग एक जैसी हुआ करती है, वैसे, अपवाद भी होते हैं. उनकी परेशानियों को मैं शब्द दे सका, यह मेरा सौभाग्य है लेकिन इस चक्कर में मैं और मेरा परिवार सार्वजनिक हो गया लेकिन यह जोखिम मैंने उठाया.  

मेरे कुछ पाठक बहुत समय से आग्रह कर रहे हैं कि मुझे तीसरे खंड के आगे की कथा लिखनी चाहिए. बहुत दिनों तक टालता रहा क्योंकि उसके बाद की बहुत सी घटनाएं मेरे यात्रा वृतांत में अंकित हैं, फिर भी, और भी बहुत सी घटनाएं हुई हैं जिन्हें क्रमबद्ध करके रही-सही कसर पूरी की जा सकती है. इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने का साहस संजो रहा हूं, लिख रहा हूं, 'ज़िंदगी एक सफर है सुहाना', मेरी आत्मकथा का अगला खंड.

जीवन एक सफर है, हम सब यात्री हैं. कुछ समय के लिए इस पृथ्वी पर आए हैं, समय पूरा होने पर निकल जाएंगे. मैं अपने जीवन कि बातें इसलिए लिख रहा हूँ ताकि उनका दस्तावेजीकरण हो जाए और आने वाली पीढ़ी को यह ज्ञात हो सके कि उनके पूर्वजों ने कैसे अपना जीवन बिताया! 

जीवन में इतने उतार-चढ़ाव रहे कि उतरते-चढ़ते सांसें फूलने लग गई हैं लेकिन सच तो यह है कि अगर जीवन ऐसा न होता तो शायद इतना मज़ा भी वहीं आता. तकलीफें न हों तो आराम का अहसास कैसे होगा, दुख न हों तो सुख का पता कैसे चलेगा? 

इसलिए यात्रा जारी है...चलते रहो. 


(1)

पुराने जमाने में एक बात सुनी थी कि डायन यदि एक बार घर देख लेती है तो बार-बार आती है. डायन होती है या नहीं, पता नहीं लेकिन शरीर को एक बार बीमारी ने खोज लिया तो वह बार-बार आती है. शरीर विज्ञान की गहराई में जाएं तो इसके भीतर असंख्य कोशिकाएं हैं जिनके संचालन से हमारा शरीर चलायमान रहता है. न जाने किस कोशिका में कब और कैसी अंतःप्रतिक्रिया होती है कि वह किसी रोग के रूप में प्रगट हो जाती है. कैंसर की बीमारी शरीर की कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण होती है, जिससे असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं लेकिन कैंसर क्यों होता है, इसका सही-सही पता अभी तक नहीं चल पाया है. 

सन 2002 मे मेरे दाहिने गाल के भीतर कैंसर हुआ था, इंदौर में डा. दीपक अग्रवाल ने सर्जरी की थी. तीन साल बाद जब मैंंने उन्हें दिखाया तो उन्होंने कहा, 'अब आपको कैंसर नहीं होगा द्वारिका प्रसाद जी.' 

सन 2008 में उसी जगह पर फिर से कैंसर के लक्षण उभर आए. इस बार मुम्बई के कोकिलाबेन अम्बानी हास्पिटल के डा. मंदार देशपांडे ने सर्जरी की. 

लगभग दो साल बाद फिर से कैंसर ने हमला किया लेकिन इस बार बाएं गाल पर, इस बार भी डा. मंदार देशपांडे ने ही सर्जरी की. दरअसल डायन ने मेरा घर देख लिया था, वह बार-बार मेरे घर आ रही थी. सर्जरी के बाद तीन दिनों तक मुंह के भीतर रुई ठुसी हुई थी, चौथे दिन निकली तो कुछ बोलना-चालना शुरू हुआ. नाक से एक पाइप डाला गया जिससे तरल खाद्य पदार्थ पेट तक पहुंचाया जा रहा था. डा. मंदार देशपांडे रोज दो बार मुझे देखने के लिए कमरे मेंआया करते थे. मुझसे मेरा हाल-चाल पूछते, मैं उनसे कहता, 'मैं बिलकुल ठीक हूं.' वे खुश हो जाते. 

एक दिन मैंने उनसे पूछा, 'डाक्टर साहब, कैंसर क्यों होता है?' वे बोले, 'पक्के तौर पर इसका कारण मालूम नहीं है. हम लोग मरीजों के इतिहास का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जो लोग तम्बाखू, सिगरेट और शराब का अधिक सेवन करते हैं, वे इस बीमारी का शिकार हो जाया करते हैं लेकिन ऐसा भी पाया गया है कि जिन लोगों ने अपने जीवन में इनका उपयोग नहीं किया है जैसे महिलाएं और बच्चे, वे भी कैंसर के शिकार हो जाते हैं. इस कारण से केवल तम्बाखू, सिगरेट और शराब को दोष नहीं दिया जा सकता है. चिकित्सा वैज्ञानिक खोज में लगे हुए हैं कि इस बीमारी की जड़ का पता लग जाए.'

मैं तीनों बार कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था में सक्रिय होकर डाक्टर की शरण में चला गया, सम्भवतः इसीलिए ठीक हो गया अन्यथा घरेलू, आयुर्वैदिक, यूनानी, होम्योपैथी या प्राकृतिक चिकित्सा के चक्कर में फंसता तो कैंसर के अधिक फैल जाने के कारण जब एलोपेथी अपने हाथ खड़े कर देती है तब बचना असम्भव हो जाता है. मेरे दामाद डा. केदारनाथ और बेटी डा. संगीता को इस बात का श्रेय जाता है कि इन दोनों ने मेरे रोग को शुरुआती दौर में पहचान लिया और एक दिन की देर किए बिना मुझे ऑन्कोलाजिस्ट के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया. इन्हीं दोनों के कारण आज मैं जीवित हूं. 

सन 2026 में पुनः बाएं गाल के अंदर कैंसर के लक्षण उभरे. मैं और संगीता दोनों मुम्बई पहुंचे, डा. मंदार देशपांडे के पास, उन्हें दिखाने. डाक्टर मुझे देखते ही खुश हो गये और बोले, 'अंकल, आप?' जिस मरीज की उन्होंने सोलह साल पहले कैंसर की सर्जरी की थी, वह 78 वर्ष का व्यक्ति यदि सामने खड़ा हो तो आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है. उन्होंने मेरी जांच की और कहा, 'ऊपरी तौर पर देखने में मुझे आपके मुंह में कैंसर नहीं दिखाई दे रहा है. जो सफेद धब्बा है वह दवा से ठीक हो जाएगा.' 

इस बार मैं फिर डायन के प्रकोप से बच गया. 

शरीर और बीमारी का सम्बंध सदा से चला आ रहा है. वातावरण की अशुद्धता, खान-पान में लापरवाही, जलवायु का दुष्प्रभाव, संक्रमण, दुर्घटनाएं आदि कई कारण होते हैं जो शरीर के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं. ये शरीर में चुपचाप प्रविष्ट हो जाते हैं और फिर अपना हुनर दिखाते हैं. हमारा शरीर इतना सम्वेदनशील है कि वह समझ जाता है कि कुछ तो गड़बड़ है और वह संकेत देने लगता है. आप-हम उस संकेत को न समझें या उसकी ओर ध्यान न दें, यह हमारी भूल है. 

अधिकतर लोग स्वयं किसी डाक्टर से कम नहीं होते, वे अपने अनुमान से दवा खाकर ठीक होने का प्रयास करते है. जब रोग आगे बढ़ता है तब वे यह तय करते हैं कि किससे इलाज़ करवाया जाए? मतलब, एलोपैथी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथी, यूनानी या प्राकृतिक चिकित्सा. छोटी-मोटी तकलीफों में कोई भी पद्धति कारगर हो जाती है लेकिन मस्तिष्क, हृदय, यकृत, पेट और कैंसर जैसी बीमारी में एलोपैथी अधिक विश्वसनीय एवं कारगर सिद्ध होती है. 

एक तो कैंसर का प्रारम्भिक स्तर पर पता लगना मुश्किल होता है क्योंकि मरीज की ओर से सही पद्धति के चुनाव में देरी, सही डाक्टर तक पहुंचने में होने वाली देरी, सेम्पल की जांच की रिपोर्ट आने में देरी आदि कारण स्वाभाविक हैं. कैंसर का पता लगने के बाद उससे तुरंत मुकाबले की तैयारी करना अनिवार्य होता है. सही अस्पताल और सही डाक्टर का चयन इसमें बेहद महत्वपूर्ण होता है. मरीज का शर्तिया इलाज़ करने के लिए सभी तैयार बैठे हैंं, भले ही उन्हें उपचार करना आता हो या न आता हो. यहीं पर मरीज़ का भविष्य तय होता है कि वह ठीक हो जाएगा या सदा के लिए 'ठीक' हो जाएगा. 

कैंसर बेढब बीमारी है. यदि शुरू में पकड़ आ गई और सही इलाज़ चालू हो गया तो मरीज बच जाता है अन्यथा रोग बढ़ जाने पर इतना सताता है कि मरीज दर्द की अधिकता की वज़ह से कराहता हुआ हर क्षण मृत्यु की कामना करता है लेकिन मृत्यु जल्दी नहीं आती, न जाने क्यों, बहुत देर करती है. उस समय न केवल मरीज़ बल्कि उसके परिवारजन भी घोर यंत्रणा से गुजरते हैं. हृदय की धड़कन रुक जाना जैसे सबसे सहज मौत है, उसके ठीक उलट कैंसर की यंत्रणा है, बहुत-बहुत कष्टदायक मौत. काश यह बीमारी हमारी दुनिया से मिट जाए!


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(2)

पुरानी एक घटना का ज़िक्र रह गया था. जैसा कि मैंने आपको बताया था कि घोर आर्थिक कष्टों के बीच भी मैंने अपनी पत्नी माधुरी से उनके आभूषणों को बिकने से बचाए रखा. उन्होंने कई बार पहल की लेकिन मैंने सदैव मजबूती के साथ मना किया. उनके जो गहने थे उसमें से कुछ गहने उनकी ननदों और देवर की शादी में लग गए थे, फिर भी उनके पास काफी गहने बचे थे जो बैंक के लाकर की शरण में सुरक्षित पड़े हुए थे. 

वे कुछ दिनों के लिए जबलपुर अपने मायके गयी और जब लौटकर आयी तो मुझे बहुत सारे रुपए दिए और कहा, 'ये लो और अपना कर्ज़ कम करो.'

मैंने पूछा, 'इतनी रकम कहाँ से लायी?'

'मैंंने गहने बेच दिए.'

'अरे, कैसे और क्यों बेच दिया, मुझसे चर्चा तक नहीं की.'

'तुम्हें बताती तो तुम मना कर देते इसलिए नहीं बताया. गहने जबलपुर अपने साथ लेकर गयी थी, वहाँ अपने भाई मदन को दे दी, उसने बेचकर ये पैसे मुझे दे दिए.' उन्होंने बताया. मैं अपना माथा पकड़ कर बैठ गया. वे आगे बोली, 'देखो, ये गहने बैंक के लाकर में बेकार पड़े हुए थे. मेरे किसी काम के नहीं थे. पहले कभी-कभार पहन लिया करती थी लेकिन मैंने इन्हें कम्मू के आश्रम जाने के बाद पहनना बिलकुल बंद कर दिया. दोनों बेटियों की शादी हो गई, अब इन गहनों का क्या काम?' 

'कुछ बचाया या नहीं?'

'शादी में मिला एक मूँगा जड़ा का सेट बचा लिया है.' वे धीरे से बोली. 

मैं क्या कहता? चिड़िया उड़ चुकी थी. उस दिन मुझे समझ में आया कि गृहिणी क्या होती है. सुनते हैं कि स्त्रियां गहनों को अपने सीने से लगाकर रखती हैं, उन्हें पहनकर और लोगों को दिखाकर खुश हुआ करती हैं लेकिन यहां तो एकदम विपरीत घटना हो गयी. माधुरी के मायके में सोने-चांदी के गहनों की दूकान है. विवाह के पहले वे बदल-बदल कर गहने पहना करती थी. खूब शौक था. विवाह के समय भी उनके पास भरपूर गहने थे, शादी-ब्याह के समारोहों में लक-दक पहन कर जाया करती थी. हमारे बेटे कुंतल के संन्यस्त होने के बाद तो उन्होंने सजना-संवरना जैसे त्याग सा दिया. गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ की उंगली में तांंबे की सर्प आकृति की अंगूठी. हाँ, कानों में हीरे की टाप्स विवाह के बाद अभी तक कायम है. 

जो कर्ज़ था मेरे ऊपर, वह सब पट गया. सबको हाथ जोड़कर जितना लिया था, वापस किया और मुसीबत के दिनों में मुझ पर विश्वास करने और सहयोग देने के लिए धन्यवाद दिया. अब 'अच्छे दिन' आ गये थे. 

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(3)

इस लेखक के साथ यह परेशानी है कि समय और काल को लेकर असावधान रहता है. कैंसर की चर्चा चली तो आपको 2026 तक ले आया जबकि 2007 की घटनाओं को बताना था लेकिन 'जम्प' मार गया. चलिए, वापस चलते हैं. 

हमारे पुत्र कुंतल को कोयंबत्तुर गये चार साल हो गये थे. हम लोगों ने उसके निर्णय को न चाहते हुए भी स्वीकार कर लिया क्योंकि इंसान जो काम करना चाहता है, जब उसे करता है तो बेहतर परिणाम आते हैं और करने वाले को आनंद भी मिलता है. हमें समझ में आ रहा था कि उसने अपने जीवन को बेहद कठिन मार्ग पर झोंक दिया है लेकिन उसे गए इतना समय बीत चुका था कि ऐसा समझ में आया कि वह वहां रम गया है. इस बीच उसने योग सिखाने के लिए उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के अनेक शहरों की यात्रा की, टीम लीडर के रूप में कई बार केदारनाथ-बद्रीनाथ-गंगोत्री और मानसरोवर-कैलास तक गया. धीरे-धीरे वह आश्रम के कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में विकसित होता चला गया. बीच-बीच में हम लोग उससे फोन पर संपर्क करके बात कर लिया करते थे. 

एक बार की बात है, मुम्बई में सद्गुरु का एक कार्यक्रम होने वाला है, उसके प्रचार के लिए वे पुणे में थे. रात को लगभग ग्यारह बजे फोन पर बात हुई. मैंने उनकी गतिविधियों के बारे में पूछा. फिर पूछा, 'अभी क्या कर रहे हो?'

'खाना बना रहा हूं.' उसने उत्तर दिया. 

'इतनी रात को? वह भी स्वयं?'

'हां, अभी कार्यक्रम का 'प्रमोशन' करके वापस आया हूं. जिनके घर में मैं ठहरा हुआ हूं वे बाहर गये हुए हैं और फ्लेट की चाबी मुझे देकर गए हैं. उनके किचन में खाना बन रहा है.'

'क्या बना रहे हो ?'

'अब इसका नाम क्या बताऊं आपको. यहां किचन में जो कुछ मुझे दिखा और मिला सबको मिलाकर कुकर में पका रहा हूं.'

'बेटा, मुझे तुम्हारी बहुत फिक्र होती है. तुम्हारे खाने तक का कोई ठिकाना नहीं है.'

'पापा, आप मेरी चिंता न करें, सद्गुरु सब प्रबंध कर देते हैं.' उसने हंसते हुए उत्तर दिया. मैं चुप रह गया.    

कुंतल की सद्गुरु के प्रति निष्ठा समझ में आ रही थी लेकिन घर-परिवार के प्रति उसकी उदासीनता हम लोगों की समझ के बाहर था. आखिर कौन सा आकर्षण है उनमें कि उसने अपना सर्वस्व उन पर न्यौछावर कर दिया? एक दूसरा सवाल यह भी उठता था कि पूरी तरह से सांसारिक मनुष्य, हंसी-मज़ाक करने वाला इंसान, नाचने-गाने वाले सहज व्यक्ति के मन में परिवार के प्रति इतना विकर्षण क्यों हो गया? 

हम पति-पत्नी दोनों ने इस विषय पर बहुत बातचीत की, चिंतन किया लेकिन वह सूत्र समझ में नहीं आया कि कुंतल सद्गुरु से क्यों प्रभावित हुआ? इस बीच हम लोग आश्रम जाते रहे, कुंतल से मिलते रहे लेकिन हमारी नज़दीकी नहीं बनी बल्कि एक दूरी स्पष्ट समझ में आने लगी. एक बात दिमाग में आयी कि एक बार हमें आश्रम की गतिविधियों में सक्रिय भाग लेना चाहिए ताकि हम आश्रम से परिचित हो सकें, शायद तब वह कारण हमारी समझ में आए.

7 जुलाई 2007 को कोयम्बत्तुर स्थित आश्रम में एक कार्यक्रम शुरू होने वाला था जिसका नाम था 'होलनेस प्रोग्राम'. यह कार्यक्रम सात दिनों का था और अंग्रेजी भाषा में होना था. माधुरी को अंग्रेजी भाषा समझ में नहीं आती इसलिए वे जाने में हिचक रही थी. मैंने उन्हें समझाया, 'चलो, समझ में नहीं आएगा तो चुपचाप सुनते रहना और जो गतिविधियां होंगी, उन्हें देखकर करते जाना.' वे तैयार हो गयी. हम दोनों 6 जुलाई को आश्रम पहुंच गये. अगली सुबह हम लोग 'स्पंदा हाल' में प्रविष्ट हो गये. हमारे मोबाइल काउंटर में जमा करवा लिए गए ताकि अगले सात दिनों तक हम सब बाहर की दुनिया को भूल कर अपना ध्यान कार्यक्रम में एकाग्र कर सकें. 

पहला दिन सामान्य रहा लेकिन अगले दिन मेरी कमर में असहनीय पीड़ा आरंभ हो गई। मेरी कमर में दर्द की शिकायत विगत दस वर्षों से चली आ रही थी, योगासन सीखते समय झुकने से उसमें झटका सा लगा और मैं अपूर्व पीड़ा के कारण त्राहिमाम करने लगा। न बैठते बने, न दो कदम चलते बने लेकिन प्रशिक्षक मेरी तकलीफ को समझने के लिए तैयार न थे। अपना दर्द बताया तो बोले- 'Carry on...no pain, no gain.' आप बताइए, एक इंसान दर्द के कारण हिल नहीं पा रहा है और वे कह रहे हैं- 'Carry on...'। प्रशिक्षक मुझे किसी क्रूर खलनायक जैसे लगने लगे, बताओ भला, यहाँ हिलते-डुलते नहीं बन रहा है और उधर से आदेश है- 'केरी ऑन'! 
          
कार्यक्रम के मध्य में अवसर मिलने पर मैं सभागार से चुपचाप भाग कर आवासीय परिसर में अपने कमरे में जाकर लेट गया। मुश्किल से आधा घंटा बीता होगा, 'कालबेल' बजी, मैंने दरवाजा खोला, एक विदेशी षोडशी कन्या बाहर खड़ी थी, उसने मुझसे कहा- 'प्रणाम।'
'
प्रणाम।' मैंने उत्तर दिया।
'
मैं योग कार्यक्रम की 'वालिंटियर' हूँ, लेबनान से आई हूँ।' उसने अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात शुरू की।
'
जी?'
'
आप कार्यक्रम छोड़कर 'स्पंद' सभागार से यहाँ क्यों आ गए?'
'
पहले आप अंदर आइये, बैठिए। दरअसल, मैं कमर के दर्द से परेशान होकर यहाँ आ गया, मुझसे योगासन करते नहीं बन रहा था।' मैंने बिस्तर पर लेटते हुए बताया।
'
क्या बहुत दर्द है?'
'
हाँ, बहुत अधिक।'
'
क्या मैं आपके कमर में '
आइंटमेंट' लगा दूँ?' वह अपने साथ वोलिनी आइंटमेंट और दर्दनिवारक गोलियां लेकर आई थी।
'ठीक है, लगा दीजिए।' मैंने कहा और अपने अधोवस्त्र ढीले करके पेट के बल लेट गया। उसने दवा लगाई, दस मिनट रुक कर पूछा- 'अब कैसा लग रहा है?'
'
पहले से बेहतर।'
'
एक 'टेबलेट' खा लीजिए, मैं पानी लेकर आती हूँ ।' उसने मुझे दवा खिलाई, पुनः दस मिनट शांत बैठी रही फिर उसने पूछा- 'अब कैसा लग रहा है?'
'
और भी अच्छा।'
'
तो फिर उठिए, खड़े हो जाइए और मेरे साथ सभागार में चलिए।'
'
पर मैं नहीं चल पाऊँगा!'
'
आप मेरे साथ चलिए तो, मैं आपको सहारा देकर ले चलूँगी, कोशिश कीजिए, बन जाएगा।' उसने आग्रह किया, मेरे पास उसके साथ चलने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। मैं उसके कंधे का सहारा लेकर दर्द से कराहता सभागार की ओर चल पड़ा।
सभागार में मैं अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गया और वहाँ फिर वही किस्सा- 'केरी ऑन.....।'
          
मैं योग कार्यक्रम से जुड़ा रहा, जैसा भी बना, करता रहा। योगासन करने में असुविधा थी लेकिन प्राणायाम और ध्यान सीखने में कोई परेशानी न थी। दिनोंदिन वातावरण समृद्ध होता जा रहा था, इतने सारे लोग मिलजुलकर जब किसी विधा को सीखते हैं तो सब एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और ऊर्जा को परस्पर संचरित भी करते हैं। हमने हठयोग, शक्तिचलन क्रिया और शून्य ध्यान का क्रमबद्ध अभ्यास किया। 
यौगिक क्रियाओं के अतिरिक्त प्रतिदिन सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आध्यात्मिक प्रवचन होते थे जिन्हें सुनना मेरे लिए अपूर्व अवसर था। प्रवचन के पश्चात जिज्ञासु प्रश्न करते थे जिनके उत्तर सद्गुरु के उत्तर हास्यबोध से आरंभ होते और सरल उदाहरणों के सहारे गंभीर निष्कर्ष तक पहुँचते। उनकी बातों में आध्यात्म के साथ ब्रह्माण्ड, विज्ञान, धर्म, और मानवीय व्यवहार की परत-दर-परत चर्चा होती जिसे सुनकर मुझे जीवन शैली और व्यवहार की नई दिशाएँ समझ में आई। उनका विस्तृत ज्ञान, अँग्रेजी भाषा का सटीक प्रयोग और उनकी वाणी का प्रभाव मेरे जीवन के अहोभाग्य अवसर जैसा था।

पांचवे दिन सुबह 9 बजे वेलियंगिरी पर्वत के शिखर तक पैदल चढ़ाई करनी थी। हमें तीन विकल्प दिए गए थे, एक- पर्वतारोहण करना है, दो- जो पर्वतारोहण न करना चाहें वे आश्रम की चतुर्दिक पदयात्रा करें, और तीन- जो दोनों के लिए तैयार न हों वे अपने कमरे में आराम करें। तीसरे विकल्प ने मुझे प्रसन्न कर दिया और उस बड़े समूह में मैं अकेला मानुष था जिसने कमरे में आराम करने वाला विकल्प चुना!
उस दिन सुबह नित्य की भांति छः बजे से अभ्यास आरंभ हुए। तीन घंटे बाद नौ बजा, सब लोग पर्वतारोहण के लिए उत्सुक थे और मैं उनके चेहरे की प्रसन्नता को देखकर कुढ़ रहा था- 'ये लोग वहाँ जा रहे हैं और मैं नहीं जा पा रहा हूँ।' अनायास मेरे मन ने कहा- 'चल, चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा।' मैंने माधुरी से कहा- 'मैं भी चलूँगा।
'
कैसे चढ़ोगे तुम? तुम्हारी कमर का दर्द?' माधुरीजी ने पूछा।
'
दर्द तो है, लेकिन तुम सब लोग पर्वत-शिखर पर जाओगे, मस्ती करोगे और मैं यहाँ बिस्तर पर पड़ा रहूँगा!'
'
रास्ते में तुम्हारी परेशानी बढ़ गई तो?'
'
वह मेरी नहीं, सद्गुरु की समस्या है, वे करेंगे व्यवस्था।'
'
तो, फिर चलो।' वे बोली।
मैंने पर्वतारोहण के लिए खास तौर से उपलब्ध कराए गए जूते पहने और सबके साथ निकल पड़ा। शिखर तक पहुँचने के लिए कोई सड़क न थी, पगडंडियाँ थी, अगल-बगल झाड़-झंखाड़ थे, छोटे-बड़े टीले थे, तीखी चढ़ाई थी, सब एक के पीछे एक ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे थे। एक युवा 'वालेंटियर' मुझे सहारा देने के लिए मेरे आसपास अनवरत चलते रहे। कुछ देर बाद तेज बारिश शुरू हो गई, राह में फिसलन हो गई, कपड़े भीग गए लेकिन किसी प्रकार अपने दर्द को दरकिनार करते हुए मैं चढ़ता ही रहा। लगभग साढ़े तीन घंटे की पगयात्रा के बाद मैं पर्वत के शिखर पर पहुँच ही गया जबकि माधुरीजी और अन्य कई लोग मेरे वहाँ पहुँचने के पंद्रह-बीस मिनट बाद वहाँ पहुँचे। उस दिन मैंने अपनी शारीरिक पीड़ा से भिड़कर संघर्ष किया और यह जाना कि कुछ भी असंभव नहीं और यह भी समझ आया कि हौसले की कभी हार नहीं होती। पर्वत-शिखर पर पहुँच कर मैं जी भर कर नाचा, वे मेरे लिए खुशी के क्षण थे...आप बताइये, थे कि नहीं ? शिखर पर हमारे भोजन की व्यवस्था थी, सद्गुरु का प्रवचन भी हुआ।
तीन घंटे रुक कर हम लोग वापस लौटे, वही पथरीला-फिसलन भरा रास्ता, वही हिम्मत, वही 'वालेंटियर' का सहारा, ढाई घंटे में तलहटी पर उतार आए। वहाँ से हम सब स्पंद सभागार में प्रविष्ट हुए, मैं थक कर चूर हो चुका था, चुपचाप पैर फैलाकर लेटने का मन हो रहा था लेकिन प्रशिक्षक ने निर्देश दिया- 'सब लोग आसन करना आरंभ करें।' फिर वही- 'केरी ऑन !'
वे सात दिन मेरे जीवन के अद्भुत अवसर के रूप में आए थे. इस अवधि में हमें यह समझ में आया कि कुंतल को कौन सा आकर्षण यहाँ खींच कर लाया. सद्गुरु की वाणी का ओज, उनकी विद्वता और उनका उस स्थान पर होना किसी भी व्यक्ति को चमत्कृत और आकर्षित कर सकता है. हम लोग अल्पकालिक साधक थे. सीखे और चले गए लेकिन कुंतल वहाँ पूर्णकालिक साधक बन कर वहीं का होकर रह गया ताकि उसके माध्यम से बड़ी संख्या में लोग इस साधना के मार्ग पर चल सकें. 

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(4)

हमारी छोटी बेटी संज्ञा के वैवाहिक जीवन में अनेक बाधाएं होने के कारण हम लोग उसे और उसकी बेटी अनन्या को अपने साथ वापस बिलासपुर ले आए थे. दामाद जी ने तलाक लेने का मुकदमा दुर्ग के परिवार न्यायालय में दायर कर दिया जहां पेशी होती थी, हम लोग वहां जाया करते थे. छोटी सी अनन्या भी हमारे साथ रहती थी लेकिन उसे क्या समझ में आ रहा है, यह हमारी समझ के बाहर की बात थी. जब भी पेशी होती, वहां पर पदस्थ समझाइश अधिकारी और जज दोनों को बैठाकर समझाते थे कि किसी प्रकार दोनों में समझौता हो जाए लेकिन दामाद जी को तलाक चाहिए था और संज्ञा तलाक देने को राजी नहीं थी. 
ऐसी ही एक पेशी में दामाद जी के वकील ने अदालत में मुझसे बात शुरू की, 'आप अपनी बेटी को समझाते क्यों नहीं कि वह तलाक दे दे.' 
'वह मान जाती तो यह मुकदमा क्यों चलता?' मैंने उनसे पूछा.
'क्यों नहीं मान रही है?'
'वह साथ रहना चाहती है.'
'आप मेरी बात को समझें, एक डिस्ट्रिक्ट जज थे जिनके लड़के के साथ यही बाधा थी, उनकी बहू तलाक देने के लिए राजी नहीं हो रही थी, पति के साथ रहने की ज़िद कर रही थी. लड़की को अदालत ने वापस ससुराल भेज दिया गया. कुछ दिनों में उसकी हत्या हो गयी. डी.जे. के घर की बात थी, पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, कुछ नहीं हुआ.'
'आप मुझे समझा रहे हैं या धमका रहे हैं?' मैंने वकील से पूछा. असल में संज्ञा के श्वसुर पुलिस में डी.आई.जी. थे, मुझे वे अपने ढंग से इशारे में बात कर रहे थे. मैं उस बात को समझ रहा था. पर संज्ञा न मानी, उसने तलाक देने से इंकार कर दिया. 
मामला बहुत लंबा चला, सात-आठ साल तक. इस बीच मुझे खबर मिली कि दामाद जी ने दूसरा ब्याह कर लिया है. उनकी नयी पत्नी के साथ उसके पूर्व पति के दो बच्चे बच्चे भी साथ में आए हैं. मुझे यह भी पता लग गया कि नई बहू किस जगह से आई है. कानूनन यह अपराध था क्योंकि पहली पत्नी से तलाक अभी तक नहीं मिला था लेकिन हमने उस बात को तूल नहीं दिया क्योंकि डी.आई.जी. के पुत्र का हम क्या बिगाड़ कर सकते थे, हम आगे नहीं बढ़े. कुछ समय बाद जज ने अपने फैसले में अनर्गल तर्क देते हुए तलाक मंजूर कर दिया. मुकदमा लड़ते-लड़ते हम लोग थक गये थे इसलिए उस अन्यायी फैसले को स्वीकार जैसा कर लिया और चुप बैठ गये. संज्ञा को न भरण-पोषण मिला और न उसके हक का स्त्री-धन जो आज भी उसकी ससुराल वालों ने अपने पास रखा हुआ है, हमने 'क्लेम' भी नहीं किया, 'रखे रहो.'        
अदालत पर हमारा भरोसा पहले से और कम हो गया.  

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(5) 

ईशा फाउंडेशन के द्वारा आयोजित आध्यात्मिक यात्रा के अंतर्गत हम पति‌-पत्नी केदारनाथ-बद्रीनाथ-गंगोत्री की यात्रा पर 11 अक्टूबर 2008 को बिलासपुर से निकल पड़े. हमें दिल्ली पहुंच कर अपनी उपस्थिति समूह को सूचित करना था. 12 अक्टूबर को हमारी यात्रा आरंभ हुई. उसी शाम हरद्वार पहुंचे. हर-हर करती गंंगा नदी की संध्या आरती देखी. अगले दिन ऋषिकेश में थे. यहां गंगा नदी का रूप अलग था, खूब चौड़ा पाट, तेज बहाव और भयभीत करने वाली आवाज़. लक्ष्मण झूला पार करके उस पार पहुंचे और बेहद मशहूर दुकान में बैठकर भोजन किया और उस दुकान की मश्हूरियत पर अपना माथा पीट लिया. मुझे अनेक तीर्थों में जाकर यह अनुभव हुआ कि वहां की दूकानों में भीड़ इतनी अधिक रहती है कि सामान की गुणवत्ता पर ध्यान देना मुश्किल हो जाता है. किसी प्रकार बनाओ, खिलाओ और ग्राहक की जेब ढीली करो क्योंकि ग्राहक को वहां दोबारा आना नहीं है. अपवाद के रूप में, गुजरात स्थित द्वारका तीर्थ का स्मरण हो आया जहां की दुकानों में बहुत स्वादिष्ट भोजन खिलाया जाता है. 

लगभग 250 तीर्थयात्रियों को पांच बस में लेकर यह तीर्थयात्रा आरम्भ हुई. प्रत्येक बस में एक-एक ईशा वालिंटियर हर समय हम सब की देखरेख के लिए हाजिर थे. हमारी बस शुरू होने के तीन-चार घंटे पहले एक मिनी ट्रक भोजन की पूर्व तैयारी के लिए आवश्यक अनाज, सब्जियां व रसोईया और सहायकों को लेकर रवाना हो जाता था. उसके साथ एक कार में कुछ वालिंटियर ठहरने और भोजन का प्रबंधन देखने के लिए चलते थे, उनमें टीम लीडर के रूप में हमारे पुत्र ब्रह्मचारी कुंतल भी थे. 
अगली सुबह हमारी यात्रा ऋषिकेश से आरम्भ हुई देवप्रयाग के लिए, जहां अलकनंदा और भगीरथी नदी का संगम है. पूरे रास्ते हमारी बस दौड़ती रही, एक तरफ रंगबिरंगे पहाड़ तो दूसरी ओर हरहराती नदी. प्राकृतिक सौंदर्य इस कदर बिखरा हुआ था कि कितना देखोगे, कब तक देखोगे? माधुरी अपने कैमरे से उन दृश्यों को सहेजने में लगी हुई थी, क्लिक करते-करते उनकी उंगलियां थक गयी लेकिन सुहानी छटा अठखेलियां करती रही और चिढ़ाती रहीं कि कितना समेटोगी? 
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित देवप्रयाग ऋषिकेश से लगभग 70 किलोमीटर दूर पर स्थित अत्यंत मनोरम स्थान है जहां बद्रीनाथ के पास स्थित सतोपंथ ग्लेशियर से निकलने वाली अलकनंदा नदी और गोमुख-गंगोत्री से निकलने वाली भगीरथी नदी का संगम होता है. इस संगम के पश्चात जो जल आगे बढ़ता है उसे पवित्र गंगा नदी का नाम दिया गया है. गढ़वाल में प्रचलित मान्यता के अनुसार भागीरथी नदी को सास और अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है, क्योंकि भागीरथी संगम स्थल में कोलाहल करती हुई आती है और अलकनंदा शांत। संगम पर दो अलग-अलग रंगों का जल एक-दूसरे में मिलते हुए स्पष्ट दिखता है।
देवप्रयाग से हम लोग रुद्रप्रयाग पहुंचे, वहाँ से कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, जोशीमठ, विष्णुप्रयाग होते हुए बद्रीनाथ पहुंच गए. जहां हम लोगों को आश्रय लेना था उससे काफी दूर बस खड़ी कर दी गई, 'इससे आगे जाना मना है.' 
हम लोग अपना सामान लेकर उस जगह पहुंचे जहां रुकने की व्यवस्था की गई थी. कमरे के ठीक पीछे बह रही अलकनंंदा नदी का भयभीत कर देने वाला शोर, ऐसा लगे कि नदी हमें बहा कर ले जाने वाली है. अंधेरा हो चला था, ठंड बढ़ती जा रही थी. शरीर गर्म कपड़ों से लदा हुआ था लेकिन वहां की ठंडक के सामने लाचार था. हम छत्तीसगढ़ के निवासी चाहे जितनी गर्मी हो, बर्दास्त कर लेते हैं लेकिन ठंड सहन नहीं होती इसलिए वहां की ठंड को 'असहनीय' माना जा सकता है. 
बाहर निकल कर जो दिखाई पड़ा वह अनोखा दृश्य आज भी मन-मस्तिष्क में अंकित है. एकदम साफ आकाश, चंद्रमा चमकता हुआ, सितारे चारों ओर छिटके हुए, आकाश के नीचे चाँदी की तरह सफेद बर्फ से ढंकी हुई ऊंची पर्वत शृंखलाएं. मैं उन सबको देखकर सम्मोहित सा खड़ा रह गया, उस समय ठंड का आभास न रहा, खुद का भी ध्यान न रहा.
उस कड़ाके की ठंड में रात का गर्म-गर्म भोजन बेहद भाया. भोजन के बाद ठंडक और अधिक लगने लगी. सुबह पांच बजे उठकर छः बजे तैयार रहने का आदेश मिला इस कारण जल्दी सोने का उपक्रम करने लगे. सामान्यतया मैं कम कपड़े पहन कर सोया करता हूं, ट्रेन में मजबूरी में पेंट-शर्ट पहन कर सोना पड़ता है इसलिए कभी शर्ट का कसाव तो कभी पेंट का खिंचाव तंग करता है, बताने का आशय यह है कि रात बेचैन रहता हूंं. यहां तो मारे ठंड के तीन परत के कपड़े पहन कर बिस्तर में घुस गए. दो रजाई ओढ़ ली लेकिन ठंड का अहसास कम न हो. दोनों पैर जितना हो सके सिकोड़ कर सोने की कोशिश की तो चेहरे पर ठंडी हवा का हमला हो रहा था. चेहरे को रजाई से ढंक लो तो सांसें थमने लगती थी, फिर खोलो, फिर ओढ़ो. सबसे बड़ा संकट तो आधी रात को आया जब मूत्राशय में दबाव शुरू हो गया. बहुत देर तक रोके रहा लेकिन जब उसे रोकना सम्भव न रहा तो किसी प्रकार साहस संजो कर रजाई से बाहर निकला और टॉयलेट में घुसा. टॉयलेट में तीन परत के कपड़ों की वज़ह से मेरी जो दुर्दशा हुई उसे क्या बताऊं, छोड़िये उसे.  
सुबह नहा-धोकर हम लोग बद्रीनाथ जी के दर्शन के लिए निकले. पौराणिक कथा के अनुसार सतयुग में भगवान विष्णु ने इस स्थल पर कठोर तपस्या की थी तब अत्यधिक ठंड और बर्फबारी से उनकी रक्षा करने के लिए लक्ष्मीजी ने बेर के वृक्ष का रूप धारण किया और प्रभु की तपस्या पूर्ण होने तक छाया बन कर खड़ी रही. लक्ष्मी जी के इस प्रयास से प्रसन्न होकर इस स्थल का नामकरण 'बद्रीनाथ' किया और वरदान दिया कि यहां उनकी पूजा हमेशा लक्ष्मीजी के साथ ही होगी. भगवान विष्णु के बद्री रूप एवं लक्ष्मीजी की भव्य प्रतिमा के समक्ष हमने सिर नवाया और मंदिर से बाहर निकल कर गर्म जल के कुंड पर गए और स्नान किया. वहां की भीषण ठंड में उष्ण जल में नहाना बहुत आनंददायक था. 
स्नान करने के पश्चात हम दोनों अपने पितरों के तर्पण करने के लिए वहां पर उपस्थित पंडितजी से क्रिया कांड संपन्न करवाने का अनुरोध किया. ऐसी मान्यता है कि बद्रीनाथ में तर्पण कर देने के पश्चात पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हो जाती है. हमने श्रद्धापूर्वक उस क्रिया को पूर्ण किया और उस स्थल की ओर गए जहां पर ईशा का समूह ध्यान कर रहा था. हम दोनों उनकी अनुमति के बिना तर्पण क्रिया के लिए बीच में छोड़कर चले गए थे, इस बात को लेकर हमें बहुत बातें सुननी पड़ी, कोई बात नहीं, एक अत्यावश्यक कार्य सम्पन्न हो गया.     
हमें बाद में एक दुखद समाचार मिला, मुम्बई से हमारे समूह में आए एक वृद्ध ने बद्रीनाथ जी के दर्शन के कुछ देर बाद अपने प्राण त्याग दिए. साथ में उनकी पत्नी और बेटा भी थे. उनका अंतिम संस्कार वहीं किया गया. हम सब का मन दुखी हो गया लेकिन भवितव्य पर किसका वश है? 
बद्रीनाथ से फिर रुद्रप्रयाग वापस आकर हमारी बस गुप्तकाशी में आकर रुकी. वहां एक दिन रुक कर हम लोग गौरीकुंड के लिए रवाना हुए जहां से केदारनाथ के लिए सोलह किलोमीटर की पैदल यात्रा आरम्भ होती है. गौरीकुंड में एक छोटा सा बाजार है जिसमें अधिकांश वे वस्तुएं बिकती हैं जो पूजा-पाठ या घरेलू उपयोग की होती हैं. तनिक आगे बढ़कर वह चढ़ाई वाला रास्ता शुरू होता है जो केदारनाथ मंदिर ले जाता है. रास्ते में चलने के लिए तीन साधन वहां उपलब्ध थे, एक, दर्शनार्थी को पीठ में लादकर ले जाने का विकल्प, दो, टट्टू पर सवार होकर जाने का उपाय और तीन, अपने कदमों से चलकर जाने का साहस. हमने सोचा, 'सोलह किलोमीटर पदयात्रा कर लेते हैं' और चल पड़े. चार-पांच किलोमीटर तक तो स्थिति सामान्य रही, उसके बाद पैरों में दर्द होना शुरू हो गया. पहाड़ की चढ़ाई बहुत कठिन होती है, सांस फूलने लगती है. आठ किलोमीटर तक चलने के बाद पैदल चलने लायक नहीं बचे, मजबूरी में टट्टू लेना पड़ा. 
उस कच्चे रास्ते पर पैदल चलना तो सुरक्षित था लेकिन टट्टू पर बैठ कर जाना बहुत खतरनाक था क्योंकि वह सड़क के किनारे-किनारे चलता था और उस ओर गहरी खाई थी जहां चौराबारी ग्लेशियर से निकली मंदाकिनी नदी बह रही थी. टट्टू वाला मुझे डरते हुए देखकर बोला, 'साब, घबराइये मत, कुछ नहीं होगा, हमारा रोज का काम है.' पर जानवर का क्या भरोसा? कब वह बहक जाए और तब यदि मैं खाई की ओर लुढ़का तो मेरे शरीर का पता तक नहीं चलेगा. थोड़ी देर में बरसात होने लगी, रास्ता फिसलन भरा हो गया, साथ ही मेरी जांघों में दर्द शुरू हो गया और बेचैनी इतनी बढ़ी कि मुझे लगने लगा कब मंदिर आएगा, कब इस घुड़सवारी से मुक्ति मिलेगी? 
अंततः हम लोग केदारनाथ पहुंच गए. उस समय शाम होने वाली थी, कुछ समय बाद अंधेरा घिरने लगा और तेज बारिश होने लगी. पहाड़ों में बारिश का आना-जाना लगा रहता है. ठंड और तीखी हो गई, कंपकंपी छूटने लगी. रात का भोजन किया और रजाई में घुस गए. अगली सुबह छः बजे तैयार रहने का आदेश था. सुबह आकाश साफ था लेकिन न जाने कब बादल आकर बरसने लगे, कोई ठिकाना न था इसलिए बरसाती पहन कर निकले. प्रातः की आरती का समय होने वाला था, हम दोनों मंदिर के द्वार में खड़े थे, अचानक मंदिर के मुख्य पुरोहित मंदिर में प्रवेश करने के लिए पधारे, मैंने उन्हें झुक कर प्रणाम किया, उन्होंने आशीर्वाद दिया, मेरी नज़रें उनसे मिली, उन्होंने इशारे से अपने पीछे आने के लिए कहा, हम दोनों केदारनाथ जी के गर्भगृह में प्रविष्ट हो गए. हमारा सौभाग्य था कि हमें केदारनाथ जी की आरती में विग्रह के इतने करीब से सम्मिलित होने का अवसर मिला.       
वहां से वापसी में ढलान थी इसलिए विशेष चिंता न थी, हम लोग पैदल ही चल पड़े. कुछ दूर चलने के बाद समझ आया कि पहाड़ में चढ़ाई हो या ढलान, दोनों कठिन होते हैं. कष्ट भुलाने के लिए मैंने एस.डी.बर्मन के गाने जोर से गाना शुरु कर दिया. एक ईशा वालिंटियर मेरे पास आया और उसने मुझसे धीरे स्से कहा, 'यह ध्यान यात्रा है इसलिए आपको रास्ते भर "ब्रह्मानंद स्वरूप ईश जगदीश, अखिलानंद स्वरूप ईश महेश" का जाप करना है' लेकिन मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया और अपनी मस्ती में फिल्मी गाने गाता रहा. आठ किलोमीटर पदयात्रा के पश्चात पुनः टट्टू की याद आई, उसमें सवार होकर हम लोग गौरीकुंड पहुंचे और बस में बैठ कर अगली यात्रा के लिए चल पड़े. 

गौरीकुंड/ सोनप्रयाग से हमारी बस रुद्रप्रयाग, श्री नगर होते हुए उत्तर काशी पहुंची जहां हम लोग रात्रि में रुके. अगले दिन भटवाड़ी, हर्षिल और गंगनानी होते हुए गंगोत्री पहुंच गए. गंगोत्री भारत के चार धामों में से एक तीर्थ स्थल है. यह समुद्र तल से 3100 मीटर की ऊंचाई पर भागीरथी नदी के तट पर स्थित है, यह भी बद्रीनाथ और केदार नाथ की तरह बहुत ठंडी जगह है. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर राजा भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी. यहां के गंगोत्री मंदिर का श्वेत स्वरूप और वास्तुकला मनमोहक है. 
अगली सुबह हम लोग हॉटल के बाहर टहल रहे थे तब ही सद्गुरु जग्गी वासुदेव भी सामने से पैदल आते हुए दिखे. हम दोनों ने उनके समीप जाकर उन्हें प्रणाम किया, उन्होंने हाथ उठाकर हमारा अभिवादन स्वीकार किया. माधुरी ने उनसे कहा, 'मैं भी आश्रम में कुछ करना चाहती हूँ.'
'जो हम बोलेंगे, करोगी?' सद्गुरु ने पूछा.
'जी करूंगी.' 
'तो फिर तीन-चार दिन के लिए आश्रम में आकर रहो, हम आपके लायक काम देखकर बताएंगे.' सद्गुरु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया. 
कुछ दूरी पर भागीरथी नदी कलकल करती बह रही थी. मन हुआ कि स्नान कर लिया जाए. यह पता करने के लिए कि पानी कितना ठंडा है, मैंने नदी में अपनी उंगली डाली तो जैसे मुझे करेंट लगा और ऐसा लगा कि मेरी उंगली नदी में ही रह गई. मैंने फिर नदी में स्नान करने का साहस नहीं किया और अपनी उंगली में लगे हुए जल से अपने सिर में छिड़काव कर लिया. कुछ दुस्साहसी लोग जल मे घुस गए और नहा लिए, मैं उन्हें देखकर विस्मित होता रहा. 
गंगा नदी का उद्गम स्थल गंगोत्री से 19 किलोमीटर स्थित गोमुख ग्लेशियर है जहां जाने का रास्ता संकरा और फिसलन वाला था. हमारे जैसे कई लोग थे जो वहां जाने का साहस नहीं जुटा पाए लेकिन 10-12 लोग वहां के लिए निकल पड़े. अंधेरा होने के पहले वे सब सुरक्षित वापस आ गए. हम लोग उनसे वहां के बारे में जानकारियां लेते रहे. उन्होंने एक आश्चर्यजनक बात बताई कि उनकी भेंट एक युवती से हुई जो अकेली एक गुफा में बैठकर साधना करने के लिए रह रही थी.

गंगोत्री से वापसी अत्यंत आल्हादित करने वाली थी, यद्यपि जो आनंद हिमालय की तराई के प्रवेश के समय मिला वैसा वापस होते समय नहीं आया क्योंकि हम लोग विगत दस दिनों से ऐसे मनोरम दृश्य लगातार देख रहे थे. घुमावदार घाटियां, रंग-रंगीले वृक्ष, ऊंचे-नीचे पर्वत और उन खतरनाक रास्तों में दौड़ रही हमारी बस, हमारे मन में मिली-जुली प्रतिक्रिया कर रहे थे, कभी आनंद तो कभी भय. चलते-चलते वे दृश्य हमारी आंखों से ओझल होने लगे और पर्वत की जगह टीले और जंगल की जगह मैदानी इलाके दिखाई पड़ने लगे, घनी आबादी दिखने लगी. हम लोग वापस ऋषिकेश पहुंच गए. एक भव्य आश्रम में सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने हमें सम्बोधित किया. उसी रात हम दिल्ली के लिए रवाना हो गए, सुबह-सुबह पहुंच गए. विगत दस दिनों में अनेक सहयात्रियों से मुलाकात हुई, वार्तालाप हुआ और अपनत्व सा हो गया था. अब सबसे विदा लेने का वक्त आ गया था. वैसे भी यात्रा के दौरान मिले लोग कम समय के लिए मिलते हैं, कुछ मधुर यादें छोड़ जाते हैं तो कुछ अप्रिय. इस यात्रा में सबके सब प्रिय थे, ऐसा अनुभव कम हुआ करता है. 
एक मुलाकात का ज़िक्र करना चाहता हूं, अमेरिका से आए एक वृद्ध दंपत्ति हमारे साथ थे. उनसे मालूम हुआ कि उनकी एक मात्र संतान, उनकी बेटी, पहले जैन संप्रदाय से जुड़ी, बाद में ईशा आश्रम में प्रविष्ट हुई और यहीं संन्यस्त हो गई. उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि वसीयत में किसे अपनी सम्पत्ति दें?
मैंने उनसे पूछा, 'आपकी एक बेटी है, आप वसीयत करें या न करें, संंपत्ति तो उसी की है, आपकी दुविधा क्या है?'
'बेटी तो आश्रम आ गई है, हमने स्वीकार कर लिया क्योंकि उसका शुरू से आध्यात्म की ओर रुझान रहा है. अब हमारी मृत्यु के बाद स्वाभाविक रूप से वह उसे आश्रम को दान कर देगी, हम दोनों ऐसा नहीं चाहते.' उन्होंने अपनी समस्या बताई. 
'आपकी मृत्यु के बाद आपकी संपत्ति का क्या होता है, यह आपकी समस्या नहीं है, आपकी बेटी की समस्या है, उसके जो मन आएगा, वैसा करने के लिए वह स्वतंत्र है.' मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की पर यह बात उन्हें स्वीकार नहीं थी. 
मैंने उन्हें बताया, 'देखिए, हमने अपनी वसीयत में अपने सन्यासी पुत्र का हिस्सा उसे देने की बात लिखी है, हमारे बाद वह क्या करेगा, उसकी मर्जी, आंखें मुंदी, किस्सा खत्म. जो होना होगा सो होगा.'
मुझे मालूम नहीं कि मेरी बात उनको जमी या नहीं लेकिन दिल्ली में विदा लेते समय दोनों पति-पत्नी हमें वहं ढूंढते हुए आए और आत्मीयता से गले लगे. 

हम लोग २४ अक्टूबर २००८ को सुबह दिल्ली पहुंचे, हमारी वापसी ट्रेन ‘सम्पर्क क्रान्ति’ शाम को साढ़े पांच बजे थी इसलिए हम दोनों दिल्ली के एक उपनगर ‘द्वारका’ में माधुरी की बड़ी बहन विद्या जवाहर अग्रवाल से भेंट करने चले गए. बिलासपुर जाने वाली यह ट्रेन निज़ामुद्दीन से आरंभ होती है जो द्वारका से लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर है इसलिए थोड़ी अधिक ‘मार्जिन’ लेकर दोपहर तीन बजे कार में स्टेशन के लिए रवाना हो गए. रास्ते में लगातार ट्रेफ़िक जाम होता रहा और जब हम लोग स्टेशन पहुंचे तब हमारी घड़ी में पांच बजकर पच्चीस मिनट हो चुके थे. स्टेशन में कुली ने हमें समझाया कि प्लेटफ़ार्म दूर है, हम लोग जब तक पहुंचेंगे तब तक गाड़ी जा चुकी होगी- ‘आप कहें तो कोशिश करें?’
‘कोशिश करो.’ मैंने कहा. 
          
ठंड के दिन थे, ठंडे हिमालय की पन्द्रह दिवसीय यात्रा थी इसलिए साथ में बहुत सामान था, कुल ग्यारह अदद ! दो कुली सामान लादकर दौड़े, सच में दौड़े. हमारे प्लेटफ़ार्म में पहुंचते ही ट्रेन ने सीटी दी और धीरे- धीरे चल पड़ी. दोनों कुली आगे-आगे, मैं उनके पीछे-पीछे और संभवतः माधुरी बहुत पीछे रह गई. धीमी गति से चल रही ट्रेन के एक कोच में कुलियों ने सामान चढ़ा दिया फ़िर मैं भी चढ़ गया, उसी समय कुली ने मुझे आवाज दी, ‘सेठ जी, सेठानी ट्रेन में नहीं चढ़ी.’
मुझे उस समय तत्क्षण निर्णय लेना था. मस्तिष्क में कई प्रश्न एक साथ उभरे, समय कम था. मुझे सूझा कि ट्रेन से  उतर जाना चाहिए और मैंने अपना चढ़ा हुआ सामान डिब्बे से बाहर फ़ेंक दिया और खुद भी उतर गया. दोनों कुली दौड़ते हुए आए, हमारा बिखरा सामान समेटा और पीछे मुड़कर ‘सेठानी’ को खोजा तो सेठानी गायब!
हज़रत निज़ामुद्दीन रेल्वे स्टेशन का प्लेटफ़ार्म सीधा नहीं वरन थोड़ा ‘कर्व्ह’ लिए हुए है इसलिए मैं कुलियों को ही सामान तकवा कर ‘ओवर ब्रिज’ तक वापस गया लेकिन माधुरी मुझे कहीं नहीं दिखी, आखिर गई कहाँ ? मैं बेहद चिन्तित हो गया कि वे कहाँ होंगी ? यदि वे ट्रेन में चढ़ गई हों तो उनके पास मोबाइल फ़ोन नहीं है, उन्हें कोच और बर्थ नम्बर भी मालूम नहीं है, कैसा करेंगी? खैर, मैं अपने सामान तक वापस पहुंचा जहां दोनों कुली खड़े थे, मैंने उनसे पूछा- ‘जब वे ट्रेन में नहीं चढ़ी तो कहाँ गई?’ 
‘तो फ़िर वे बाद में चढ़ गई होंगी पर हमने उनको डिब्बे में चढ़ते हुए नहीं देखा.’ वे बोले.
‘फ़िर कैसा किया जाए?’
‘जैसा आप बोलें.’
‘चलो वापस, टिकट-खिड़की के पास सामान ले चलो.’ मैंने उनसे कहा. लगभग पौन घन्टे बाद मेरा मोबाइल बजा, किसी यात्री के मोबाइल फ़ोन से उन्होंने बात की और मुझसे पूछा, ‘कब से तुमको खोज रही हूँ, तुम कौन से कोच में हो और बर्थ नम्बर क्या है?’
‘मैं तो हजरत निज़ामुद्दीन स्टेशन में हूँ, तुम कहाँ हो?’
‘मैं तुम्हें यहां एक-एक कोच में खोज रही हूँ, मुझे न तो कोच मालूम है और न बर्थ नम्बर, पर तुम तो ट्रेन में चढ़ गए थे, मैंने तुम्हें चढ़ते देखा था फ़िर उतरे क्यों?’
‘कुली ने मुझे आवाज देकर बताया कि तुम नहीं चढ़ पाई.’
‘अरे नहीं, जब मैंने देखा कि तुम सामान सहित डिब्बे में चले गए हो तो पीछे के डिब्बे में दौड़ कर चढ़ गई.’
‘अब कैसा किया जाए? तुम एक काम करो, मैं तुमको कोच और बर्थ नम्बर बताता हूँ, वहाँ जाकर बैठो और अगले स्टापेज आगरा में उतर जाना, मैं कोई दूसरी ट्रेन पकड़कर आगरा पहुँचता हूँ.’
‘तुम न जाने कब आगरा पहुँचोगे, मैं वहाँ अकेले प्लेटफ़ार्म में नहीं बैठ सकती, अब अन्धेरा भी हो गया है, ठंड लग रही है. मैं तो अब बिलासपुर जा रही हूँ.’
‘कैसे जाओगी? न तुम्हारे पास टिकट है, न पैसे हैं, न पानी है, न खाना है और न ही ओढ़ने-बिछाने का है.’
‘तुम मेरी चिन्ता छोड़ो, कोई न कोई मदद मुझे मिल जाएगी, मैं देखती हूँ. तुम अपना इन्तज़ाम बनाओ और सामान लेकर बिलासपुर पहुँचो. मैं चली.’ माधुरी ने अपना निर्णय सुनाया.
           
ट्रेन में माधुरी विचित्र संकट का सामना कर रही थी. उन्हें प्यास लगी तो हमारी आरक्षित सीट पर ही अनधिकृत रूप से विराजमान सहयात्री से पानी मांगा तो उसने देने से इंकार कर दिया और कहा, ‘यह पानी नहीं, बंगला साहेब का पवित्र जल है, आपको नहीं दे सकती.’ आस-पास कुछ छात्राएं बैठी थी लेकिन किसी के पास पानी नहीं था, पास में दस रुपए भी न थे कि पानी की बाटल खरीद सकें. छात्राएं रायपुर की थी. उनके एक ग्रुप लीडर साथ में थे जो माधुरी की परिस्थिति को समझ कर मदद के लिए आगे आए. उन्होंने माधुरी को एक सौ रुपए दिए, टीटी से बात की और ‘सेटिंग’ की. एक छात्रा ने अपनी शाल दी, इस प्रकार उन मददगारों के मिल जाने से माधुरी के संकट का समाधान हो गया. अंततः वे बिलासपुर पहुंच गई. मैं भी अगले दिन सारा सामान लेकर जब घर पहुंचा तब मेरी सांस में सांस आई. यह रहा, हमारी ध्यान यात्रा का समापन!

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(6)

कर्ज़ पट गया था इसलिए बहुत अरसे बाद चैन की सांस ले रहा था. उस बोझ को ढोते-ढोते मैं तंग आ चुका था और उस पटाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया तब सबसे मुक्ति मिली. 
हमारी बड़ी बेटी संगीता और दामाद केदारनाथ रायपुर के शासकीय दंत महाविद्यालय में व्याख्याता के पद पर नियुक्त हो गए, उनकी एक बेटी मैना उनके परिवार में प्रविष्ट हो गई. 
इधर हमारे साथ छोटी बेटी संज्ञा हमारे घर लौट आई, उसके साथ एक नन्ही सी परी का आगमन हो गया, अनन्या जिसे हम लोग प्यार में 'आनी' कहा करते थे. संज्ञा के पारिवारिक तनाव का असर हम लोगों पर था लेकिन पूरा जीवन तनाव झेलते-झेलते अब अभ्यस्त हो गया था. हम पति-पत्नी अक्सर उसकी ससुराल की बातें याद करके दुखी हो जाया करते थे लेकिन सोचा करते थे 'बीती ताहि बिसार दे' लेकिन बीती बातों को भुलाना बहुत कठिन होता है. कितनी आशाओं के साथ हमने अपनी बेटी को उसकी ससुराल विदा किया था, दोनों के प्यार को पारिवारिक स्वरूप देकर हम लोग बहुत खुश थे लेकिन चाहा क्या, क्या मिला? 
दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे से 'किसी प्रकार' निभाना अनिवार्य तत्व होता है. अपने जीवनसाथी में वे सब गुण नहीं होते जो हमें चाहिए, हम में भी वे गुण नहीं होते जो साथी को चाहिए. गुण और अवगुण के बीच में एक महीन रेखा होती है जिसे सद्गुण कहा जा सकता है. यह सद्गुण आपसी समझदारी और सहनशीलता से विकसित होता है. अतीत में यह सहज सम्भव था लेकिन अब जागरूकता के कारण हर एक व्यक्ति आज़ादी चाहता है, बोलने की आज़ादी, काम करने या न करने की आज़ादी या मनमाना सुनने, समझने और करने की आज़ादी.
आपसी व्यवहार का बहुत महत्व होता है. यदि दोनों सौहार्द्र पूर्ण व्यवहार करेंगे तो प्रेम बढ़ते रहता है. पति कर्कश हो, या पत्नी कर्कशा हो तो विवाद संघर्ष का रूप ले लेते हैं. दो व्यक्ति जब विवाहित होने के कारण एक साथ रहने के लिए बाध्य हो जाते हैं तो धीरे-धीरे एक-दूसरे के गुण और दोष को जान लेते हैं. यदि गुणों पर फोकस रहा तब तो गृहस्थी की गाड़ी ठीक चलती है और यदि दोषों पर नज़र रही तो फिर मामला गड़बड़ हो जाता है. कमी-बेशी को स्वीकार कर लेने में ही समझदारी है.
दोनों के बीच प्यार बना रहे, इसके लिए एक-दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखना जरूरी होता है. पति की इच्छा रहती है कि उसकी पत्नी उसके परिजनों का आदर करे और उनकी जरूरतों का ध्यान रखे; पत्नी भी चाहती है कि उसका पति उसके मायके वालों के साथ सज्जनतापूर्वक व्यवहार करे, उनके आने-जाने पर या उनसे फोन पर बात करने में आपत्ति न करे. छोटी-छोटी बातें बड़े महत्त्व की होती हैं, मीठे बोल और सदाशयता के दूरगामी प्रभाव होते हैं.  'मैं' के स्थान पर 'हम' का भावना से दैनन्दिनी चलाना असंभव नहीं है, बस, थोड़ी सी सावधानी की ज़रुरत होती है.

विवाह के तुरंत बाद जो शारीरिक आकर्षण दोनों के बीच होता है, वह शनैः शनैः कम होता जाता है. इसका मतलब दूरी बना लेना नहीं है, बल्कि समय-समय पर गले लग जाना, लिपट जाना और चुम्बन लेना जैसी क्रियाओं से जीवन में रोमांस कायम रहता है. विवाह चाहे जितना पुराना हो, उसमें ताजगी बनी रहनी चाहिए. जन्मदिन को याद रखना, कुछ उपहार देना, गुलदस्ते का आदान-प्रदान वैवाहिक संबंधों को मजबूती देते हैं. 
एक बात ध्यान देने योग्य है कि विवाह फूलों की सेज नहीं है, काँटों का ताज है. इस ताज का सावधानी से उपयोग जो जोड़े करते हैं, वे आजीवन सुखी रहते हैं और उनमें आपसी प्यार दिन-ब-दिन बढ़ते जाता है. 

अजय साहेब ने लिखा है :

'अगर मिले हैं गम तुम्हें, तुम्हारे पास मैं तो हूं,
न खुद को यूं बुझाओ तुम, तुम्हारी आस मैं तो हूं,
वो खुशियों की हो धूप या, उदासियों की बारिशें,
सहेंगे साथ-साथ हम, मिलेंगी जो भी आफतें,
जहां में प्यार से बड़ा कोई भी आसरा नहीं
जहां में ऐसा कौन है कि जिसको गम मिला नहीं.'

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(7)

जब इंसान के पास पैसे की कमी रहती है तो ध्यान केवल उस कमी को दूर करने में लगा रहता है. कमी तो दूर होती नहीं बल्कि और बढ़ती जाती है. यदि कर्ज़ है तो वह दुष्चक्रवृद्धि की गणना से बढ़ते जाता है. इधर की टोपी उधर, उधर की टोपी इधर, करते-करते दिमाग घूम जाता है, मन में लगता है कि कैसे इस संकट से उबरेंगे? बार-बार उधार देने वाला भी तंग हो जाता है और उधार लेने वाला धीरे-धीरे मायूस और बेसहारा होते जाता है. 
साधनों की तंगी को वही जानता है जो इस चक्कर में कभी फंसा हो. पुरानी कहावत है कि मनुष्य को अपने पैर सिकोड़ कर सोना चाहिए, जितनी चादर हो उतने पैर फैलाओ लेकिन जब बुरे दिन आते हैं तो समझ में आता है कि इस जीवन में मुफलिसी से कैसे जूझा जाता है? जेब जब खाली रहती है तब फिज़ूलखर्ची नहीं सूझती लेकिन दो समय का भोजन, साधारण कपड़े, बच्चों की पढ़ाई का खर्च तो जरूरी होता है इसलिए कर्ज़ लेना पड़ता है. बेटियों की शादी करने के लिए जेब में अधेला न हो तब कहीं से जुगाड़ बैठाना होता है.  
एक बार की बात है, मुझे एन.टी.पी.सी. में प्रशिक्षण देने की एवज़ में कुछ राशि मिली थी, उसमें से एक हज़ार माधुरी को देते हुए मैंने कहा, 'किसी पार्टी या शादी में पहनने लायक एक साड़ी खरीद लो.' उस समय एक हज़ार में अच्छी साड़ियाँ बाज़ार में मिल जाया करती थी. माधुरी बाज़ार से उतने रुपयों में चार साड़ियाँ ले आई. मैंने उनसे पूछा, 'ये क्या? तुमसे ऊँची साड़ी लाने के लिए कहा था?' वे बोली, 'साड़ी की कोई कीमत नहीं होती, यह साड़ी पहनने वाले के ऊपर है. यदि सलीके से पहनी जाए तो वह बेशकीमती लगती है और यदि साड़ी पहनना नहीं आता तो मंहगी साड़ी भी सस्ती लगती है.' पैसे के सदुपयोग का इससे अच्छा उदाहरण और क्या होगा? 
हमारे बच्चे भी गज़ब के थे. उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान अपने हाथ खींच कर काम चलाया. कभी किसी चीज का कोई आग्रह नहीं. जो मिला उसी में संंतुष्ट रहे. मुझे आज ऐसा लगता है कि उनकी इन असुविधाओं के लिए मैं दोषी हूं. मैंने कमाई बहुत की लेकिन उसे बचाया नहीं. धनवान वे होते हैं जो धन को कमाने के साथ-साथ निर्ममता से उसे बचाते हैं और बचत को विनियोजित करते हैं. मुझे व्यापार में धन कमाने के बहुत अवसर मिले लेकिन अपने संयुक्त परिवार में 'न' कहना मुझे नहीं आया जिस कारण से मेरी जेब सदा खाली रही. उसके बाद कोढ़ में खाज हो गई, मैं घर से खाली हाथ निकल गया, अच्छी-खासी चलती हुई मिठाई की दूकान छोड़ कर छोटे भाई को दे दी. मैंने अपने पैर में कुल्हाड़ी अपने हाथों से मार ली, फिर तो वैसा ही हुआ, जैसा होना था. असल में मैं 'ज़ीरो से हीरो' बनना चाहता था, वह प्रयोग असफल सिद्ध हुआ. 'जीरो से माइनस' होना शुरू हो गया और अर्थ संकट मेरे जीवन के चौबीस वर्ष लील गया. मुझे चारों तरफ से मदद मिलती रही जो मरणासन्न व्यक्ति के लिए प्राणवायु की तरह काम करती रही, मेरी बेहोशी में आंखें खुल जाती, बिस्तर से उठकर चलने लगता और फिर सक्रिय हो जाता. 
इस बीच एक प्लॉट खरीद लिया, उसमें छोटा सा घर बना लिया और किराये वाले घरों से मुक्ति पा ली, तीनों बच्चों की पढ़ाई पूरी हो गयी, दो लड़कियों का विवाह हो गया और मेरे गाल पर हुए कैंसर की तीन सर्जरी हो गई. कुल मिलाकर मेरा काम किसी तरह निपट गया और मैं सुरक्षित बच गया.  

जब अर्थ समस्या का समाधान हो गया और कुछ आवक बढ़ी तो मेरे मन में दबी हुई इच्छाएं अपना सिर उठाने लगी. सन 1960 में जब फिल्म 'जंगली' देखा था तब अपनी प्रिय सायराबानो को देखा था था जिसकी मनमोहक छबि आज भी मेरे दिल के किसी कोने में बसी हुई है. इसी फिल्म में काश्मीर का नज़ारा भी देखा था तब से मैं इस स्वर्ग को अपनी आंखों से देखने का सपना संजोए हुए था. 
सन 2010 में ऐसा योग बना कि हम लोग सपरिवार काश्मीर के लिए निकल पड़े, साथ में वैष्णो देवी के मंदिर जाने का कार्यक्रम भी जुड़ गया. पहले हम लोग कटरा पहुंचे. रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह हम लोग मंदिर जाने के लिए निकले. बाणगंगा से पैदल निकले और अर्धक्वारी होते हुए लगभग 13 किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा पूर्ण करने के बाद देवी के दर्शन मिले. पहाड़ों में बारिश न हो, ऐसा हो नहीं सकता, बरसते पानी में पैदल चलना अच्छा लगता है पर पैरों में चलने से उभरा दर्द अधिक हावी रहा. लौटते समय हम लोग मंदिर से ढाई किलोमीटर दूर स्थित सांझीछत से हेलीकाप्टर सेवा का उपयोग करके कटरा वापस लौटे. 
जीवन में पहला मौका था जब हेलीकाप्टर में बैठने का मौका मिला, बहुत मज़ा आया, मैं रास्ते में सोचता रहा कि काश! मैं राजनीति से जुड़ गया होता तो इस तरह के मौके बार-बार मिलते लेकिन मेरे दिल की दिल में ही रह गयी. सच बताऊं? मेरे मन में सांसद बनने की प्रबल इच्छा थी लेकिन मुझे उसके लिए परिवार या राजनीति में किसी एक का चुनाव करने की बाध्यता थी, मैंने अपने परिवार को चुना. 
होटल वापस लौटे तो शरीर थकान से चूर हो गया था, जो पलंग में पसरे तो फिर अगली सुबह नींद से जगे. वहां हमारे लिए एक टैक्सी, जिसका ड्रायवर एक सिख नवयुवक था, तैयार खड़ी थी. कटरा से श्रीनगर की यात्रा शुरू हो गयी. मौसम ठंडा और सुहाना था. सड़क के दोनों ओर इतनी हरियाली थी कि देखते-देखते आंखें थकने लगी. रास्ते में एक ढाबा में भोजन के लिए कार रुकी. हम लोग वहां बिछी हुई खटिया में बैठ गए और वहा पर काम कर रहे सहायक से पूछा, 'क्या क्या मिलता है तुम्हारे यहां?' 
'राजमा और चावल.' उसने बताया. 
'बस, और कुछ नहीं? 
'आप इसे खाइए तो, पूरे जीवन भर याद रखेंगे, सच बोल रहा हूं.' उसने विश्वास के साथ अपने सामान की तारीफ की. हमने कहा, 'ले आओ फिर, सात प्लेट.'
उसकी बात में इतनी सच्चाई थी कि उस गर्मागर्म राजमा-चावल को खाए हुए आज सोलह वर्ष बीत चुके हैं, उसका स्वाद आज भी मेरी स्मृति में है और उसकी चर्चा मैं अपनी आत्मकथा में कर रहा हूं. 
कटरा से श्रीनगर 240 किलोमीटर दूर है, हम लोगों को रुकते-रुकाते वहां पहुंचने में आठ घंटे लग गए. रात वहां के पूर्व आरक्षित होटल में बिताई. ठंड बढ़ गई थी. हम गर्म प्रदेश में रहने वाले लोग हैं, हमें ठंड जरा अधिक महसूस होती है. अब काश्मीर में ठंड तो होनी ही थी, इसे भारत का स्विट्जरर्लेंड यूँ ही थोड़े कहा जाता है!
डल झील के सामने हमारा हॉटल था और बाहर निकले तो एक हिंदुस्तानी सिख का रेस्टोरेंट था. 'हिंदुस्तानी' शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि काश्मीर में अपने इधर से आए लोगों को प्रवासी हिंदुस्तानी माना जाता है, उन्हें काश्मीरी नहीं, चाहे वे लोग कितने भी पुराने क्यों न गए हों. भारत से गए यात्रियों को भी वे विदेशी-यात्री समझते हैं. उनके चेहरे पर हमें देखकर आई मुस्कुराहट 'प्रोफेशनल' होती है, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह कोई वेश्या अपने ग्राहक को खुश करने के लिए प्यार जताने का नाटक करती है. उनसे हुई बातचीत में मैंने समझा कि वे पाकिस्तान के जितने नज़दीक हैं, भारत से उतने दूर जबकि उनके जीवनयापन की व्यवस्था भारत की ओर से की जाती है तथा उस प्रदेश की पर्यटन से होने वाली आय का अधिकांश हिस्सा भारतीय यात्रियों के सौजन्य से उन्हें मिलता है. हमें वे लोग 'इंडियन' कहते हैंं, जैसे उनका देश अलग हो, और हमारा देश अलग. 
सरदार जी के यहां का नाश्ता, आलू पराठा और दही, बहुत स्वादिष्ट था. चाय भी मजेदार. हम लोग अपनी कार में बैठे और काश्मीर की छटा देखने के लिए निकल गए. श्रीनगर काश्मीर की राजधानी है, बहुत खूबसूरत जगह है. सबसे पहले हम लोग यहां के बागों को देखने के लिए निकले. इंदिरा गांधी तुलिप गार्डन हमारा पहला पड़ाव था. इसकी खूबसूरती मन को मोह लेने वाली है. इस बड़े बाग में तुलिप की 60 से अधिक प्रजातियोंं के पौधे लगे हुए हैं जो मार्च-अप्रैल में पूरी तरह से खिल जाते हैं. अलग-अलग रंगों की कतार में उगे तुलिप के फूलों की छटा को देखना एक अद्भुत अनुभव प्रदान करता है. उसके पश्चात मुगल गार्डन पहुंचे जो मुगल काल में बना था, इतने सालों के बाद आज भी हरा-भरा और सुव्यवस्थित है. इसी तरह शालीमार बाग भी अपनी सुंदरता मुगल काल से आज तक बिखेर रहा है. सन 1629 में जहांगीर द्वारा अपनी पत्नी की याद में बनाया गया यह बाग अपने स्थापत्य और उत्तम जल एवं पुष्प प्रबंधन का एक जीवंत स्मारक है. 
शाम को हम लोग डल झील पहुंचे और रात भर रुकने के लिए पानी में स्थित शिकारे में प्रविष्ट हो गए. इतनी खूबसूरत सजावट, आकर्षक बेडरूम, ड्राइंग रूम और डायनिंग हाल कि देखकर मज़ा आ गया. रात का भोजन उन्होंने हमसे पूछकर बनाया, अत्यंत स्वादिष्ट. दूसरे दिन नौकायन के लिए निकल पड़े. रास्ते में पानी में उगाई जाने वाली सब्जियां और फूलों को देखकर मन विस्मित हो गया. पानी में तैरता हुआ सब्जी बेचने का बाज़ार भी देखने को मिला. काश्मीर-यात्रा के ये दो दिन ज़िंदगी भर याद रहेंगे.       
अगले दिन हम लोग गुलमर्ग के लिए निकल गए. पूरा रास्ता हरा-भरा और मनमोहक दृश्योंं से भरपूर था. ऐसा लगा जैसे पृथ्वी की सारी सुंदरता यहीं आकर बस गई है. गुलमर्ग जिसका मूल नाम गौरीमर्ग है, बारामूला जिले में 2650 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. एशिया की सबसे ऊंची केबल कार परियोजना गोंडोला में बैठकर पहाड़ों के ऊपर और आसमान से नीचे का सफर बेहद रोमांचक रहा. 
गुलमर्ग में पहाड़ पर बर्फ बिछी हुई थी. युवा ऊपर चढ़कर नीचे खिसक कर आने का आनंद ले रहे थे और हम वृद्ध नीचे से खड़े-खड़े उनके आनंद का आनंद ले रहे थे. हमारी चार साल की नातिन अनन्या अपने छोटे हाथों से बर्फ को उठाकर उसके लड्डू बना रही थी, अचानक वह जोर से रोई, मैं उसकी ओर दौड़ा, उसके हाथ की दोनों गदेलियां ठंड के कारण अकड़ गई थी. मैंने सहलाकर सामान्य करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. वहीं पास में एक झोपड़ीनुमा दूकान थी, किसी काश्मीरी मुस्लिम की, जिसमें चाय और बिस्किट बिकती थी. मैंने उससे कहा, 'जरा पानी गर्म कर दो, बच्ची का हाथ गल रहा है.'
'मेरी दूकान बंद हो रही है' अब नहीं हो सकता.' उसने टका सा जवाब दिया. 
'एक काम करो, अपना गैस चुल्हा चालू कर दो, बच्ची अपना हाथ सेंक लेगी.'
'गैस खत्म हो गई है.' उसने अपना मुंह घुमाते हुए कहा. मेरा दिल हुआ, उसका नड्डा मसक दूं लेकिन मेरा ध्यान अनन्या की ओर गया, वह लगातार हाथ को झटकते हुए रो रही थी. मैंने अपने दोनों गदेलियों से उसकी गदेलियों में जोर से घर्षण करना जारी रखा, कुछ देर में वह सामान्य हो गई. बात आई गई हो गई लेकिन उस दूकानदार का का गैर-इंसानी बर्ताव मुझे आज तक याद है. 
इस प्रकार हमारी काश्मीर यात्रा का समापन हो गया.  

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(8)
  
मनुष्य का भविष्य अबूझ है. अगले पल का ठिकाना नहीं है, कल और कल के बाद के बारे में क्या अनुमान लगाया जा सकता है? मेरा वास्ता अनेक कुंडली एवं हस्तरेखा के जानकारों से पड़ा है लेकिन उनका कथन सदा ही आधा-अधूरा निकला. हिंदुओं की जाति-बिरादरी में विवाह पूर्व लड़के व लड़की कि कुंडली मिलान करने का प्रचलन है. कुंडली मांगलिक है या नहीं, गुण मिल रहे हैं या नहीं मिल रहे हैं, संतान योग है या नहीं है, जीवन सुखमय रहेगा या नहीं, आयु कितनी है? आदि. किंतु समय आने पर बताई गई भविष्यवाणियां गलत सिद्ध हो जाती हैं, सारा ज्ञान ध्वस्त हो जाता है. लेकिन, अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोग भी पंडितों की शरण में पहुंचते हैं. उसमें भी संकट तब उत्पन्न हो जाता है जब एक पंडित कहता है, 'कुडली का मिलान नहीं हो रहा है, विवाह करना उचित नहीं होगा', वहीं पर दूसरा कहता है, 'संबंध कर लीजिए, बहुत अच्छे योग हैं.' अगर पंडित को यदि यथायोग्य धन-प्रदाय कर दिया जाए तो वह मनमाफिक कुंडली भी बनाकर दे देता है. कुल मिलाकर ब्याह करना जोखिम भरा काम होता है, क्या पता जिस सिक्के को उछाला जा रहा है, चित्त आएगा या पट्ट?
आजकल, शिक्षित युवा इन सब झंझटों से दूर, एक-दूसरे को भली-भांति देख-समझ कर विवाह कर रहे है, जिसे प्रेम विवाह कहा जाता है. यह असल में प्रेम विवाह नहीं होता क्योंकि इनमें प्रेम की मात्रा बहुत कम होती है, एक-दूसरे के विचार मिलने की बात अधिक रहती है. इन शादियों का भविष्य पंडितों के हाथ में कम, विवाहित जोड़ों के हाथ में अधिक रहता है. समाज में आया यह परिवर्तन अभी प्रयोग के दौर में है, परिणाम अनुकूल भी हैं और प्रतिकूल भी.   
पति-पत्नी के बीच मतभेद हमेशा से रहे हैं. जब एक माँ के गर्भ से उत्पन्न संतानों में मतभेद हुआ करते हैं तो दो अलग-अलग परिवार और संस्कार से निकले व्यक्तियों में आपसी मतभेद होना स्वाभाविक है. पुराने समय में कम उम्र में ब्याह हो जाता था, दोनों के विचारों में लोच होता था. अगर कोई बात हो जाती थी तो घर के भीतर ही पनपती रहती थी लेकिन अब खुल कर बाहर आने लगी है. बात घर से बाहर निकलकर अब पुलिस थाने और अदालतों तक पहुंचने लग गई है. साथ निभाने का भाव अब कम हो रहा है, न निभे तो अलग हो जाने का निर्णय अधिक हो रहा है. न निभने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन निभने के सर्वमान्य सूत्र हैं, एक-दूसरे से आत्मिक प्यार और परस्पर सहयोग. 
अब नए जोड़े संतानोत्पत्ति के बारे में भी सोच-समझ कर निर्णय लेने लगे हैं. शादी के शुरुआती कुछ वर्ष तो 'मज़े' लेने के लिए आरक्षित रखते हैं. अगर इस बीच कोई बच्चा आ गया तो पूरा ध्यान बच्चे की तरफ चला जाएगा, इसलिए अपना ध्यान भटकाने वाली झंझट मोल नहीं लेना है. बच्चों की संख्या पर भी नियंत्रण होने लग गया है क्योंकि उनका पालन-पोषण और शिक्षा अत्यधिक मंहगी हो गई है इसलिए वे इस मामले में सावधानी बरतने लग गए हैं. ये लोग एक बच्चे में हांफने लगते हैं, हमारे जमाने में 'दो या तीन बच्चे, घर में होते हैं अच्छे' का नारा था और हमारे पूर्वजों के युग में स्त्रियां बच्चे पैदा करने की घरेलू मशीन के रूप में उपयोग आया करती थी. 
बहुत पुरानी, पुरानी और आज की स्थिति में बहुत अंतर आ गया है. स्त्रियों की दुर्दशा और शोषण में कमी आई है, वहीं पर आजकल उनका 'अपर हेंड' भी दिखाई देता है. शिक्षा और जागरूकता के प्रभाव के कारण अब परिस्थितियां करवट ले रही हैं. अब के विवाह में दोनों के बीच लिंगभेद तो होता है लेकिन व्यवहारभेद नहीं रहता. लड़का तो लड़का है, लड़की भी लड़कों जैसी हो गई है. दोनों की आवाज में जन्मना अंतर है लेकिन स्वर एक जैसा हो गया है.
मेरी पत्नी माधुरी जब 52 साल पहले घर की बहू बन कर आई थी, तब वह एक संयुक्त परिवार से 'शिफ्ट' होकर दूसरे संयुक्त परिवार में आई. हम दोनों के परिवार लगभग एक जैसे थे, दोनों के पिता कड़क, दोनों की मां सीधी, दोनों तरफ तीन भाई और छः बहनें. इतनी साम्यता होने के बावजूद वातावरण का अंतर था, स्वभाव का अन्तर था, काम-काज का अंतर था, जिम्मेदारियों का अंतर था.
माधुरी के आते साथ मेरे बड़े भाई रूपनारायण जी रायपुर 'शिफ्ट' हो गए, उन्होंने अपना नया व्यवसाय तीन साल पहले वहां जमा लिया था. संभवतः वे नई बहू की प्रतीक्षा में थे कि 'वह आये तो हम लोग यहां से जाएं.' भाभी जी के जाने के बाद माधुरी घर में बड़ी बहू की भूमिका निभाने लगी.
माधुरी का शुरुआती समय काम सीखने और अपने ढंग से चौके को व्यवस्था करने में लगा. सिर में पल्लू लेकर पटे में बैठकर चूल्हे में खाना बनाना, कुछ वर्षों पश्चात कुकिंग-गैस और स्टीम-कुकर की मदद से खड़े होकर खाना बनाना. दिन के समय हमारे घर में दाल, भात, रोटी, दो किस्म की सब्जियां और कढ़ी या दही से निर्मित कोई सामान बनना आवश्यक था, रात में पूरियां और आलू की रसीली सब्जी, यह हमारे घर का नियमित भोजन था. प्रतिदिन एक या दो मेहमान भोजन करने के समय अवश्य हाजिर रहते थे. माधुरी ने अपना उत्तरदायित्व खुशी-खुशी निभाया, हां, संयुक्त परिवार में जैसा और जो कुछ होता है, उससे वह कई बार हतोत्साहित हो जाया करती थी और कभी मुझसे बताती तो मैं कहता, 'देख लो, तुम अपने ढंग से निपटो.' पारिवारिक मामलों में मैं सदा उनके लिए असहयोगी भूमिका में रहा, वह मेरा समझौतावादी दृष्टिकोण था या तटस्थता, जो भी रहा हो, मैं आज अपने व्यवहार पर अफसोस करता हूं, मुझे उनका पक्ष लेने लिए आगे आना चाहिए था.
दो बार ऐसा भी हुआ कि वे घर छोड़कर हमारी स्वीट शॉप में आकर बैठ गई, 'अब मैं उस घर में पैर नहीं रखूंगी', लेकिन समझा-बुझा कर कुछ देर बाद घर वापस ले गया. वे फिर से घर के काम में लग गई. आज के जमाने में ऐसा मान-मनव्वल सम्भव है क्या?
वर्तमान माहौल कुछ अलग चल रहा है. सभी रिश्ते अब दोस्ती में बदल रहे हैं. जिस प्रकार दोस्ती में व्यवहार होता है, वैसा व्यवहार पिता-पुत्र, मां-बेटी और पति-पत्नी के बीच घटित होना शुरू हो गया है. यदि बात-व्यवहार में लोच है तो चलेगा अन्यथा कुट्टी. 
एक तरह से यह परिवर्तन उचित हुआ है, किसी एक पक्ष की दादागिरी खत्म हो रही है और दोनों के बीच सार्थक संंवाद स्थापित हो रहा है. संयुक्त परिवार में सबसे बड़ी कमी संवादहीनता की थी. परिवार में जो भी कर्ता होता था वह अपने मन की बोलता था, बाकी सब चुपचाप सुना करते थे. कर्ता का निर्णय अंतिम होता था, चाहे वह एकतरफा और मूर्खतापूर्ण ही क्यों न हो. मैंने अपने जीवनकाल में ऐसी स्थिति का बहुत सामना किया इसलिए मैंने अपने बच्चों के साथ व्यवहार करने में यह सावधानी रखी कि हम लोगों के बीच एकतरफा संवाद न हो. मैंने महसूस किया है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग लेकिन उपयोगी संदेश देती है. यदि बड़े अपने अहंकार को त्याग कर छोटों की बात सुनने का प्रयास करें तो नए जमाने में जो चल रहा है, उसकी उन्हें जानकारी मिलेगी और निर्णय लेने में आसानी होगी. 
हमारी बेटी संगीता का जब इंदौर डेंटल कालेज में चयन हुआ तब माधुरी ने यह खबर दद्दाजी (मेरे पिताजी) को सुनाई तो वे असहज हो गए. उनकी छः लड़कियां थी, उन्होंने किसी को ठीक से पढ़ाया-लिखाया नहीं, कोई चौथी पास तो कोई आठवीं पास, बस 'घर में रहो और घर का काम सीखो.' सबको ब्याह दिया, लड़की के पिता होने की भूमिका समाप्त. यहां तो लड़की को डाक्टरी पढ़ाने और बाहर भेजकर पढ़ाने की बात थी. 
उन्होंने धीरे से समझाते हुए कहा, 'बहू तुम लड़की को बाहर पढ़ने के लिए भेज रही हो, तुमको डर नहीं लगता?' 
'नहीं तो.' माधुरी ने उत्तर दिया. 
'अरे, बाहर भेज रही हो, कुछ ऊंचा-नीचा हो गया था तब?'
'जो होगा देखा जाएगा, मुझे उस बात का भय नहीं है. एक बात बताइए, अपने परिवार में आजतक कोई डाक्टर है क्या?'
'नहीं तो.' 
'हमारे घर में कोई डाक्टर बनने वाला है, आपको इस बात खुशी होनी चाहिए.' माधुरी ने बात सम्भाली.
दद्दाजी चुप रह गए. यह दोतरफा संवाद का प्रभाव था जो संगीता के डाक्टर बनने में सहायक सिद्ध हुआ. आज संगीता रायपुर (छत्तीसगढ़) में शासकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय में व्याख्याता के रूप में पदस्थ है. 

प्रकृति ने हर मनुष्य को एक जैसा शरीर दिया है. शारीरिक संरचना पर गौर करें तो हम सब के शरीर की भौतिक बनावट एक जैसी है. शल्य चिकित्सक जब शल्यक्रिया करता है तब चूंकि सबके अंग की अंदरूनी बनावट एक जैसी होती है, वह सभी के शरीर में समान रूप से शल्यक्रिया करता है. 
यद्यपि सभी मनुष्यों के शरीर की संंरचना एक जैसी होती है, मस्तिष्क की भी किंतु सबके दिमाग में विचार भिन्न-भिन्न होते हैं. यह उनकी अनुवांशिक विशेषताएं, तंत्रिका जालों के अंतर्संबंध और मस्तिष्क के काम करने के ढंग में अंतर होने के कारण होता है. विचारों के अलग-अलग होने के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे परिवार में मिले संस्कार, मनुष्य के जीवन में मिले उसके अनुभव, उसे प्राप्त शिक्षा और ज्ञान, उसकी भावनाएं और उसका स्वभाव. यही वज़ह है कि संसार में करोड़ों लोग हैं जो मनुष्य तो हैं लेकिन हर व्यक्ति का अपना विशिष्ट दृष्टिकोण होता है, अपनी सोच होती है. 
परिवार एक इकाई है जहां विभिन्न विचारों वाले लोग एक छोटे से समूह में रहते हैं. यद्यपि परिवार में सबको एक जैसे संस्कार दिए जाते हैं, फिर भी सबकी सोच में अन्यान्य कारणों से अंतर होता है. सब एक दशा में रहें या एक दिशा में चलें, ऐसा संंभव नहीं. इसीलिए अंतर्विरोध उपस्थित होते हैं जो आगे चल कर परिवार में संवाद की जगह विवाद को जन्म देते हैं. यहीं से उनमें वैचारिक मत-भिन्नता उत्पन्न होती है और परिवार में विघटन की शुरुआत. ऐसा देखा गया है कि जिन परिवारों में खुल कर बातचीत होती है, वहां पर गलतफहमियों की गुंजाइश कम होती है और आपसी बातचीत में बात बन जाती है. 
हमारे संयुक्त परिवार में संप्रेषण की कमी हमेशा रही, सामान्यतया एकालाप चलता रहता था जिसकी वज़ह से अंदरूनी नासमझी सभी के बीच बनी रही. मेरे बब्बाजी (दादाजी) और दद्दाजी (पिताजी) के बीच, दद्दाजी और अम्माजी के बीच, दद्दाजी और हम तीनों भाइयों के बीच मुखर न सही लेकिन चुप्पी वाली असहमति बनी रही. हमारा घर एक तरह से सभी के लिए दद्दाजी के द्वारा निर्मित यातना गृह बन गया जिसमें हम सब रहते थे और अपनी सहन शक्ति को बढ़ाते रहते थे. सन 2000 में दद्दाजी के देहावसान के पश्चात यह किला धूलधूसरित हो गया. उनके प्रस्थान के पश्चात सब लोगों के मध्य सार्थक संवाद स्थापित हो गया. 

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(9)

तमिलनाडु में स्थित कोयम्बत्तुर में देश-विदेश से दर्शनार्थी आते हैं, ध्यानलिंग, भैरवी देवी व आदियोगी के दर्शन करने लेकिन मैं आया करता हूँ अपने पुत्र कुंतल, अब स्वामी ऋजुडा, से मिलने जो विगत तेईस वर्षों से सद्गुरु जग्गी वासुदेव के शिष्यत्व में आश्रम की विभिन्न गतिविधियों में संलग्न हैं। त्रिची एन.आई.टी. से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इलेक्ट्रिकल्स विषय में इंजीनियर बनने के बाद उन्होंने अपने शेष जीवन को इस आश्रम से सम्बद्ध कर लिया।

इस आश्रम में पहली बार मैं 2003 में आया था, आश्रम देखने गया था, कुछ समझ नहीं आया। वो दुनिया हमारी दुनिया से अलग है। काम, व्यस्तता और समस्याएँ जैसी हमारी दुनिया में हैं, वैसी उस दुनिया में भी है लेकिन फर्क है। फर्क यह है कि हम अपने जीवन के बाहरी आयाम को विकसित करने के यत्न करते हैं जबकि वे जीवन के आंतरिक आयाम को छूने का प्रयास करते हैं। हमें उनकी बात समझ नहीं आती क्योंकि वहाँ की गतिविधियों में प्रविष्ट हुए बिना हम उन्हें नहीं समझ सकते, वे हमें पागल से लगते हैं लेकिन वे हमारी दुनिया से होकर गए हैं इसलिए वे दोनों दुनिया को भलीभाँति जानते-समझते हैं। हम 'स्व' को बढ़ाने में लगे हैं, वे 'स्व' को मिटाने में लगे हैं। चूंकि हम बचपन से अभ्यस्त हैं इसलिए अहंकार के बिना जीना हमारे लिए बहुत कठिन है, वे अहंकार दूर करने की कठिनता को सरल बनाने में लगे हैं, अपने लिए और दूसरों के लिए भी। हम काम के बदले आराम की खोज में रहते हैं लेकिन उनके जीवन में आराम शब्द है ही नहीं, वे निरंतर काम करते हैं, स्व को छोड़कर सर्वजनहिताय।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव से मैं उस समय से नाराज़ चल रहा हूँ, जब से हमारा बेटा कुंतल उनके आश्रम से सम्बद्ध हो गया, आज भी मैं उनसे रुष्ट हूँ। आश्चर्य होगा आपको कि मैं कुंतल से नाराज नहीं हूँ क्योंकि हर मनुष्य को अपने जीवन की राह चुनने की स्वतन्त्रता है, उसे भी थी। देर-सबेर सही, हमने भी उनके निर्णय पर अपनी मुहर लगा दी और अपने मन को समझा-बुझा कर उनके निर्णय को अपने अनुकूल कर लिया लेकिन आध्यात्म की राह अपना कर कुंतल अपने अपनों से दूर हो गया। यह ऐसी पीड़ा है जिसे हम निरंतर  सह रहे हैं, संभवतः कुंतल हमारी पीड़ा को समझते होंगे। यह सही है कि उनकी नज़दीकी असंख्य लोगों से हो गयी लेकिन हमसे उनकी एक दृश्य दूरी बन गयी। हम भी उन असंख्य लोगों की भीड़ में से एक हैं जिनसे आज उनकी नज़दीकी है। आध्यात्म के मार्ग में पारिवारिक मोह-माया बाधा है, यह हमें मालूम है, लेकिन आध्यात्म हमारे पारिवारिक तानेबाने के मार्ग में क्यों बाधा बन गया, यह अफसोस हर समय मेरे मन में बना रहता है। इसका दोष मैं सद्गुरु जग्गी वासुदेव पर मढ़ता हूँ क्योंकि उनके चुम्बकीय आकर्षण के सामने हमारा दुनियावी आकर्षण कमजोर पड़ गया। जो जादुई संसार हमने कुंतल के जीवन के इक्कीस वर्षों में रचा, वह सहसा धाराशायी हो गया और हम गुजरते कारवां को देखते रह गए !

मैं आश्रम इसलिए जाता हूँ ताकि इन बूढ़ी आंखो से अपने पुत्र को जी भर कर देख सकूँ, उसकी मीठी आवाज़ को अपने कानों से सुन सकूँ और यह सुनिश्चित कर सकूँ कि वह आश्रम का कार्य ठीक से कर रहा है या नहीं?

शुरुआत में जब मैं आश्रम गया था, वहां पर तमिल का बोलबाला था और अंग्रेजी का. हिंदी भाषा न कोई बोलता था और न समझता था. वैसे, मैंने तमिलनाडु में हिंदी बोलने के लिए दुराग्रह देखा लेकिन आश्रम में तो उत्तर भारत के लोग भी पहुंचते हैं, उनको होने वाली असुविधा पर वे लोग ध्यान नहीं देते थे. इसी वजह से हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोग आश्रम से परिचित नहीं थे और सद्गुरु का नाम केवल दक्षिण भारत में जाना जाता था. 

सन 2007 में आश्रम में एक सात दिवसीय कार्यक्रम हुआ था, 'होलनेस प्रोग्राम' जिसमें भाग लेने के लिए हम पति‌-पत्नी गए थे. कार्यक्रम की संपूर्ण प्रस्तुति अंग्रेजी भाषा में थी. मेरी अंग्रेजी ठीक-ठाक है लेकिन माधुरी की अंग्रेजी 'जीरो'. उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन दूसरे प्रतिभागी जैसा कर रहे थे उसे देखकर वे भी अभ्यास कर रही थी. प्रतिदिन सद्गुरु के दो से तीन घंटे प्रवचन हुआ करते थे वह उनके सिर के ऊपर से निकल रहा था, बहुत बेचैन थी. एक प्रश्नोत्तर सत्र में मैंने खड़े होकर कहा, 'यहां पर कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें अंग्रेजी समझ में नहीं आती, अच्छा होगा यदि जो बात कही जाती है उसका संक्षिप्त में ही सही, हिंदी अनुवाद कर दिया जाए.'

'कार्यक्रम के विवरण में यह स्पष्ट लिख दिया गया था कि इसका माध्यम अंग्रेजी होगा, अब यह शिकायत कैसी? मुझे हिंदी नहीं आती, मैं अंग्रेजी के अलावा तमिल, कन्नड़, मलयालम और तेलुगु भाषाएं जानता हूं, आप कहें तो इन भाषाओं में बोल सकता हूं.' सद्गुरु ने अंग्रेजी में उत्तर दिया. मैं चुप होकर बैठ गया, परंतु उस दिन मैंने आश्रम में हिंदी का बीज बो दिया.  

जैसा होना होता है, वैसी परिस्थितियां बन जाया करती हैं. आश्रम में कुंतल का काम पूरे भारत में घूम-घूम कर 'इनर इंजीनियरिंग' की क्लास लेना चल रहा था. अचानक उसे 'डेंगू' बुखार हो गया. कोयम्बत्तुर के एक अस्पताल में वह बहुत दिनों तक वह भर्ती रहा. स्वस्थ होने के बाद उसको आश्रम से बाहर भेजना बंद कर दिया गया और 'पब्लिकेशन' विभाग में काम दे दिया गया. उनके साथ बिहार से आए एक और स्वामी भी थे, स्वामी चित्ता. इन दोनों ने आपसी चर्चा में यह तय किया कि सद्गुरु के यू-ट्यूब पर उपलब्ध प्रवचनों को हिंदी भाषा में 'डब' करके तैयार किया जाए. इसके लिए सद्गुरु की अनुमति आवश्यक थी, उन्होंने डरते-डरते उनसे पूछा तो वे बोले, 'कुछ डबिंग करके मुझे बताओ.' उन दोनों ने कुछ प्रवचनों का हिंदी अनुवाद किया और डबिंग करके सद्गुरु को सुनाया. कुछ सुधारों के बाद उन्होंने उसकी अनुमति दे दी. जैसे ही हिंदी अनुवाद यू-ट्यूब पर आया, धूम हो गई. उसके बाद बड़ी संख्या में उत्तर भारत में सद्गुरु का नाम पहुंच गया और उन्हें अखिल भारतीय लोकप्रियता प्राप्त हो गई. अब आश्रम में सर्वाधिक संख्या हिंदी बोलने वालों की दिखाई पड़ती है. सन 2007 मैंने जो बीज बोया था, उसकी फसल अब लहलहाने लगी है. मेरा अनुमान है कि हिंदी का महत्व सद्गुरु को समझ में आ गया होगा. एक उल्लेखनीय बात यह है कि सद्गुरु के 'लाइव' अंग्रेजी प्रवचनों का त्वरित अनुवाद कुंतल करते हैं. इस कार्य को वे इस खूबी से करते हैं कि ऐसा लगता है जैसे सद्गुरु हिंदी भाषा में ही बोल रहे हैं, आवाज कुंतल (स्वामी ऋजुडा) की होती है. 

आश्रम का जीवन बहुत कठिन है. सुबह तीन बजे उठना, नित्यकर्म के पश्चात गुरुपूजा, फिर घंटों लंबी साधना और उसके बाद सौंपे गए कार्य का निष्पादन, फिर भोजन, तद्पश्चात पुनः कार्य से जुड़ना, रात्रि दस बजे शयन. बीच-बीच में कई दिनों के लिए 'साइलेंस'. एक मिनट की फुर्सत नहीं. घर-परिवार के लोग कभी-कभार मिलने पहुंचे तो उनसे भी बातचीत के लिए समय की बेहद कमी. आम तौर पर लोग सोचते हैं कि आश्रम का जीवन मज़े की ज़िंदगी है, संयास ले लिया, घर की जिम्मेदारी छोड़कर भाग गए लेकिन हमारा पुत्र विगत तेइस वर्षों से आश्रम में है, मैंंने प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया कि वे लोग वहां अपूर्व श्रम करते हैं, इतना अधिक कि हम सांसरिक लोग उस लगन और परिश्रम की कल्पना तक नहीं कर सकते. क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है, इन सब बातों के लिए उनका 'फोकस' इतना स्पष्ट रहता है कि उसे जानकर आश्चर्य होता है और खुशी भी. 'कारपोरेट सेक्टर' में होने वाले कामगार की तरह उनकी मानसिक तैयारी होती है और वहां के स्वामी उसी शैली में पूरी निष्ठा से, और, बिना किसी प्रतिफल के अपना सब कुछ अर्पण करते हैं. अद्भुत है उनके निःशुल्क सेवाभाव को देखना और समझना.   

एक बात वहां और देखने में आई, जितने स्वामी हैं वहां, सब ऊंची 'डिग्री होल्डर'. उनमें से कई तो लाखों की सैलरी छोड़कर आश्रम में आए हैं. उन सब के मन में कुछ बहुत अच्छा कर गुजरने की तमन्ना देखी मैंने. वे जनसमूह में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के उन्नयन के लिए लगातार प्रयासरत है. वे संसार में ऐसे लोगों को तैयार करना चाहते हैं जिनमें सकारात्मक सोच हो, जीवन जीने का उत्साह हो तथा अपना जीवन दूसरों के कल्याण के लिए अर्पित करने का भाव हो. ईशा आश्रम का संचालन स्व-चलित शैली में होता है, सच पूछें तो वहां कोई प्रबंधक दिखाई नहीं पड़ता लेकिन सभी कार्य सुव्यवस्थित होते हैं. जो लोग वहां पर तैनात हैं, वे पूरे मनोयोग से, खुशी के साथ, बिना किसी अपेक्षा के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए लगे हुए हैं. सबसे बड़ी बात है, इतने अधिक लोगों का समूह वहां पर रहता है लेकिन पूर्ण शांति के साथ, कोई आवाज़ नहीं, कोई शोर नहीं. सदगुरु जग्गी वासुदेव साल में आधा समय आश्रम से बाहर रहते हैं लेकिन मानसिक रूप से वे हर समय उपस्थित रहते हैं. 

मैंने कुंतल से पूछा, 'सद्गुरु के बाद कौन?' 

'सदगुरु के बाद ध्यानलिंग.' उसने उत्तर दिया. 

एक बात मुझे अवश्य खटकती है कि कुंतल ने अपना संसार तो व्यापक कर लिया लेकिन हमारे संसार को और छोटा कर दिया. जब हमारे बच्चे किशोरावस्था में थे तब हम पति-पत्नी ने यह निर्णय लिया था कि हम अपने बच्चों को उनके मन के अनुसार उन्हें विकसित होने का अवसर देंगे. कुंतल के विवाह के बाद केवल एक बार बहू को अपने घर में रखेंगे और अगली बार जब वो मायके से यहां आएगी तो उनके लिए अलग घर की व्यवस्था बनाकर देंगे ताकि हम सब के बीच प्रेम-व्यवहार बना रहे. परिस्थितियों ने ऐसी करवट ली कि न कुंतल का विवाह हुआ, न हम लोगों को अपनी बहू का चेहरा देखने को मिला, न पोते‌-पोती को गोद में खिलाने का आनंद प्राप्त हुआ. उसने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और आश्रम की गोद में चला गया. 

आश्रम का नियम-संयम ऐसा है कि उसे अपने परिवार से दूरी बनाकर रखनी है, वह अपनी तरफ से दूरी बनाने की पूरी कोशिश करता है लेकिन हम लोग उससे दूरी नहीं बना सके. उसको दुविधा में डालते रहते हैं, साल में दो-तीन बार उससे मिलने का कार्यक्रम बनाते हैं, जहां पर वह उपलब्ध होता है वहां चले जाते हैं और कुछ देर के लिए सही, उसे उसके परिवार की याद दिला कर खुश हो लेते हैं. जब भी वह मिलता है, बड़े आदर के साथ मिलता है, प्रेम से घर-परिवार-दोस्त और बिलासपुर की बातें करता है, विदा करते समय भूमि में मस्तक रखकर प्रणाम करता है. 

पिछली बार उसने हमें प्रस्ताव किया था, 'आप लोग वहां का काम समेट कर यहां आश्रम में आ जाएं, यहां रहें. आप लोगों की पूरी व्यवस्था हो जाएगी.' हम दोनों ने मुस्कुरा कर रह गए. दरअसल जिस प्रकार उसे आश्रम भाता है, उसी प्रकार हमें अपना घर भाता है और अपना यह संसार. वह वहां खुश, हम यहां खुश.

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व्यापार का अर्थ है, अपना माल या अपनी सेवाएं बेचना. व्यापार न तो सरल होता है, न कठिन, हमारी उस काम में रुचि की मात्रा उसे सरल या कठिन बना देती है. व्यापार करना सायकिल चलाने जैसी क्रिया है, पायडल जैसा चलाएंगे वैसी सायकिल चलेगी, तेज या धीमी, और पायडल चलाना रुका और सायकिल रुकी. यह अपने-आप बहुत दिनों तक नहीं चलता, इसे लगातार आगे बढ़ाना होता है. व्यापार में सफलता मिल सकती है और नहीं भी. बहुत से कारक होते हैं, सबसे मुख्य होता है, ग्राहक की जरूरत को समझना. उसके बाद आती है सामान या सेवा की गुणवत्ता, फिर आपके बात-व्यवहार का तरीका. इन तीन बातों का सम्मिश्रण यदि है तो सफलता की संभावना अधिक हो जाती है. अपना सामान या सेवा बेचने के लिए ग्राहक की नाक में एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ाना पड़ता है जिससे ग्राहक के मन उसके लिए भूख जैसी जागृत हो जाए. जब ग्राहक आपकी ओर आकर्षित होगा तब वह आपका ग्राहक बनेगा. मरुस्थल में प्यास से तड़प रहे मनुष्य के सामने पानी का गिलास बेशकीमती होता है, इसी प्रकार अपने सामान या सेवा के बारे में बताकर ग्राहक की मानसिक भूख को जगाना ही व्यापार का मुख्य सूत्र है.

कई दूकानदार अपना सामान बेचने के लिए ग्राहक पर दबाव डालते हैं, सलाह पे सलाह पेलते हैं, इस तरह की तानाशाही किसी को भी पसंद नहीं आती. मर्जी उसकी चलती है जिसके जेब में पैसे होते हैं. आपको अपना माल या सेवाएं बेचना है इससे ग्राहक को कोई मतलब नहीं होता, वह अपनी जरूरत के मुताबिक खरीदी करता है. व्यापारी को इस बात को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि खरीदने का उद्देश्य ग्राहक में निहित है, माल या सेवा में नहीं. 'मैं'और 'मेरा' ये दो शब्द विक्रय कला में बहुत बड़ी बाधा होती है, 'आप' और 'आपका', ये दो शब्द बेशकीमती हैं. विक्रय कला को जानने का असली रहस्य मनुष्य के स्वभाव को समझने में है.    

दस साल की उम्र से मैं व्यापार से जुड़ा. बारह साल तक मिठाई बेचा, उसके बाद सात महीने वकालत की, वकालत मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं थी इसलिए उसे त्याग कर फिर से मिठाई बेचने लगा. पंद्रह साल की लंबी पारी खेलने के पश्चात मैंने टेलीविजन और फर्नीचर पंद्रह साल तक बेचा, इस बीच व्यक्तित्व विकास और मानव व्यवहार के प्रशिक्षक के रूप में प्रशिक्षण देने का भी व्यवसाय भी किया. विगत छब्बीस वर्षों से लॉज चला रहा हूं, मतलब जिंदगी का अधिकांश हिस्सा व्यापार करने में लगा दिया. वकालत को छोड़ दें तो जिस काम को किया, पूरा दिल लगाकर किया और उन सब में पर्याप्त सफलता मिली. 

इन दिनों बिलासपुर के सदर बाजार में श्री जगदीश लॉज चला रहा हूं. मज़े का काम है, मालिक की भूमिका केवल देखरेख की होती है, बाकी काम स्टाफ देखता और करता है. हमारी लॉज की लोकेशन अच्छी है इसका लाभ मिलता है लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने के कारण नुकसान भी होता है. नुकसान के कुछ और इंतज़ाम भी हमने कर रखे हैं, जैसे रिसेप्शन में बोर्ड में लिख रखा है, 'जोड़े में आने वालों का रिश्ता पति-पत्नी या भाई-बहन का होना चाहिए, अन्य रिश्ते मान्य नहीं हैं', अब बताइये, आज की परिस्थिति में यदि कोई होटल इस नियम का कड़ाई से पालन करेगा तो उसका होटल कैसे चलेगा? रोज बिना नागा अनेक जोड़े अपने मनोरंजन के लिए आते हैं, अधिक से अधिक एक घंटा रुकते हैं और पूरे एक दिन का किराया देकर चले जाते हैं. अब, हमने इस पर 'बैन' लगा रखा है तो कैसे कमाई होगी? एक और बात, 'यदि आप पीने-पिलाने के शौकीन हैं तो किसी दूसरे होटल में चले जाइए, यह लॉज आपके लायक नहीं है', अब, आज के युग में ऐसा नियम लागू है तो बहुत बड़ी संख्या में ग्राहक होटल आने से बिदक जाएंगे. धंधा करने बठे हैं तो ग्राहक की जरूरत को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए लेकिन हमारे यहां तो उल्टी गंगा बह रही है! लेकिन चाहे जो भी नुकसान उठाना पड़े, हम इन दोनों नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं. इनकी वज़ह से एक फायदा हमें होता है, परिवार के साथ आने वाले ग्राहकों के लिए हमारा लॉज उनकी प्राथमिकता में होता है और उन्हें हमारे लॉज में सुरक्षा और शांति का अनुभूति होती है. दाल-रोटी अच्छी चल रही है, साथ में एक छोटी चम्मच घी भी मिल जाता है. 

व्यापार में एक खास बात होती है कि कभी अच्छा चलता है तो कभी कमजोर, कभी खुशी तो कभी गम. स्टाफ का वेतन, बिजली की खपत और रख-रखाव का खर्च यथावत चलता रहता है, ग्राहक आए. न आए. व्यापारियों में एक बात कही जाती है, 'मौत और ग्राहक के आने का कोई भरोसा नहीं'. मौत का खेल तो किसी को समझ में नहीं आता लेकिन ग्राहकों का कम आना दूकानदार के लिए चिंता का विषय होता है. कई दूकानदार अपनी दूकान के सामने नीबू-हरी मिर्च लटकाते हैं लेकिन यह टोटका भी काम नहीं करता, तब चिंता और बढ़ जाती है परंतु ग्राहक पर दूकानदार का जोर नहीं चलता. उसको जब आना होगा तब आएगा, मेरे एक मित्र सुधीर खंडेलवाल की दूकान में जब ग्राहक नहीं आते थे तो वे मेरी दूकान मधु छाया केंद्र, जो उनकी दूकान के सामने थी, में आकर बैठ जाया करते थे और फिल्म 'सोहनी महिवाल' का यह गाना गुनगुनाया करते थे, 'आने वाले को आना होगा...'. नौकरी पेशा में यह सुविधा रहती है कि कैसी भी स्थिति हो, हर महीने का वेतन पूरा मिलेगा लेकिन व्यापार में ऐसा नहीं होता. दूकान में ग्राहक आए तो आए, नहीं आए तो नहीं आए. व्यापार चला तो चला, नहीं चला तो नहीं चला. सफलता के किस्से हर जगह सुनाए-बताए जाते हैं लेकिन असफलता की बातें कोई नहीं बताता जबकि सफल लोगों के मुकाबले असफल की गिनती अधिक होती है. कितनी दूकानें और कारखाने न चल पाने के कारण बंद हो जाते हैं, लोग घाटे में पड़ जाते हैं, इसकी चर्चा नहीं होती जबकि उनकी असफलताएं के कारणों पर भी गौर किया जाना चाहिए.  

बचपन से अब तक व्यापार किया, नौकरी कभी नहीं की. व्यापार मेरे खून में पुस्तैनी है. एक बात का मैंने अनुभव किया कि व्यापारी का बच्चा यदि सच्चाई और ईमानदारी का दामन थाम ले तो उसके सफल होने की संभावना अधिक हो जाती है. झूठ, बेइमानी, धोखाधड़ी से फौरी तौर कुछ फायदा दिखाई दे सकता है लेकिन वैसे घोड़े लंबी रेस के नहीं होते. 

अखबारों और फेसबुक के अधिकतर विज्ञापन भ्रमित करने वाले होते हैं, जो लिखा जाता है वैसा असल में नहीं मिलता, कुछ और ही होता है. ग्राहक किसी प्रकार उनकी पकड़ में आ जाए, उसके बाद वह उनका हो जाता है, घुमा-फिराकर अपनी बातें उसको समझा देंगे और माल बिक जाएगा किंतु सिर्फ एक बार. जब ग्राहक को अपने ठगे जाने का अहसास होता है तब वह दोबारा उस दूकान में पैर नहीं रखता लेकिन वह किसी नई ठिकाने में ठगाने के लिए फिर से मजबूर हो जाता है. ग्राहकों की मोलभाव करके कीमत कम करवाने की प्रवृत्ति का दोहन आजकल बड़े पैमाने पर हो रहा है. एम.आर.पी. ज्यादा और बेचने की कीमत कम बताकर उसे दिग्भ्रमित किया जाता है और ग्राहक मूर्ख बनकर खुशी-खुशी पैसे देकर सामान खरीद लेता है. 'एक पर एक फ्री' और 'एक्स्चेंज' ऑफर में इतना बड़ा धोखा है कि ग्राहक को समझ में नहीं आता, दूकानदार खुश और ग्राहक भी खुश. 

व्यापार में घपलेबाजी का एक सच्चा किस्सा बताता हूं, बिलासपुर के मध्य में एक थाना है, सबसे पुराना थाना जिसका नाम है सिटी कोतवाली. उसके सामने है बिलासपुर म्युनिस्पाल्टी का स्कूल म्युनिस्पल स्कूल जिसका नाम शास्त्री जी के निधन के बाद लालबहादुर शास्त्री स्कूल हो गया है. यह बात 70 साल पुरानी है, म्युनिस्पल स्कूल की विपरीत दिशा में, थाने के सामने एक मज़मेबाज जिसका नाम दरयाव खान था, जमीन पर बोरा बिछा कर मज़मा दिखाया करता था. मज़मेंबाज़ का मतलब है, छोटी-मोटी जादूगरी दिखाने वाला इंसान जो बच्चों के लिए मज़ेदार करतब दिखाने वाला. शहर में तीन-चार और मज़मेबाज थे जो सब दरयाव खान को अपना गुरू मानते थे और उसे 'गुरू दक्षिणा' भी दिया करते थे. भारत विभाजन के बाद सन 1948 में  पाकिस्तान से भारत आकर बिलासपुर में टिक गया और मज़मा दिखा कर अपना परिवार चलाता था. दरयाव खान के साथ पाकिस्तान से मोतीराम सिंधी भी आया था, दोनों के बीच इसीलिए दोस्ती भी थी. मोतीराम ने गोलबाज़ार में किराने की दूकान खोली जिसका नाम था, मोतीराम आनंद राम.  

एक दिन की बात है दरयाव खान अपने पुराने परिचित मोतीराम की दूकान में पहुंचा और उससे कहा, 'मेरे पास एक ऐसी दवा है जो दाद-खाज में बहुत अच्छा काम करती है. इसे तुम अपनी दूकान में रखकर बेचो, मुझे बिक जाने के बाद के बाद पैसे देना.' यह कहकर 12 डिब्बी दिया और चला गया. चार आने में एक डिब्बी बेचना था, एक डिब्बी में एक आने का फायदा मिलने वाला था. 12 डिब्बी चार दिन में बिक गई. उसके बाद जो उस दवा के ग्राहक आते थे, लौट जाते थे. मोतीराम ने पुराना पैसा दिया और 12 डिब्बी फिर उधार में ले गया. एक सप्ताह में वह भी बिक गई. दरयाव खान की दवा बेचकर मोतीराम बहुत खुश था क्योंकि उसे उधार में माल मिल रहा था और मुनाफा भी अच्छा हो रहा था. अगली बार दरयाव खान 12 दर्जन डिब्बी लेकर उसकी दूकान में पहुंचा और बोला, 'मैं दो महीने के लिए बाहर जा रहा हूं, इतनी डिब्बियां रख लो क्योंकि ग्राहक लौटना नहीं चाहिए परंतु इस बार इसका पैसा तुम्हें अभी देना होगा, मैं बाहर जा रहा हूं, मुझे पैसे की ज़रूरत होगी.' मोतीराम हिचकिचाया लेकिन दवा की बिक्री अच्छी थी और मुनाफा भी भरपूर हो रहा था, उसने पूरा पेमेंट कर दिया. दरयाव खान ने पैसे गिनकर लिए, अपनी जेब में रखा और चला गया. 

मोतीराम ने देखा कि दवा का कोई ग्राहक नहीं आ रहा है, उसे चिंता हुई लेकिन दरयाव खान उसे सिटी कोतवाली के पास दिखा ही नहीं. एक दिन रास्ते में जब दरयाव खान मिला तो मोतीराम ने कहा, 'तुम्हारी दवा की एक डिब्बी तक नहीं बिकी. अपनी दवा वापस ले जाओ और मेरा पैसा वापस करो.'  दरयाव खान ने कहा, 'मेरा उसूल है कि मैं बिका हुआ माल वापस नहीं लेता.' और वहां से रफूचक्कर हो गया. 

एक परिचित ने दरयाव खान से पूछा, 'मोतीराम तुम्हारे नाम पर रो रहा था! तुमने क्या किया, उसका माल वापस क्यों नहीं ले रहे हो?' दरयाव खान ठहाका मार कर हंसा और बताया, 'वह दवा नहीं, ग्रीस भरी थी, डिब्बियों में.'

'और, शुरू में बिक्री अच्छी हुई, बाद में ग्राहक आना क्यों बंद हो गए?'

'मैं अपने ही आदमियों को ग्राहक बनाकर उसकी दूकान में भेजा करता था.' 


कुछ अपवादों को छोड़ दें तो व्यापार में बेईमानी और मुनाफ़ाखोरी इस कदर बढ़ गई है कि व्यापारी मनुष्य के बदले राक्षस दिखाई पड़ता है। पैसा कमाना, बहुत सा पैसा कमाना और किसी भी तरह कमाना- किसी संक्रामक रोग की तरह बढ़ चुका है। जो जितना अधिक कमा लेता है, उसकी भूख उतनी अधिक बढ़ती जाती है। किसी भी तरह पैसा कमाने की अंधी दौड़ में कितने-कितने धराशायी हो गए जिनको कोई नहीं जानता। 

एक ‪नामी-गिरामी फायनेंस कंपनी ने मुझे अपने 'स्टाफ' को प्रशिक्षण देने के लिए रायपुर बुलाया। लगभग अस्सी 'मार्केटिंग एक्सीक्यूटिव' ('सेल्समेन' का आधुनिक नामकरण) उपस्थित थे, साथ में कुछ अधिकारीगण भी। पहले सत्र में तीन घंटे तक 'मोटिवेशन' विषय पर चर्चा हुई और भोजन के उपरांत 'काउंसिलिंग' का सत्र हुआ। 'काउंसिलिंग' के दौरान प्रतिभागी अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान पूछ रहे थे। उनमें से एक चर्चा आपको बताना चाहता हूँ :
'सर, मैं बहुत परेशान हूँ, सर।' प्रतिभागी ने कहा।
'कहिए?' मैंने पूछा।
'हमारी कंपनी हर महीने हमें 'बिजनेस टार्गेट' देती है जिसे 'अचीव' करना बहुत कठिन रहता है।'
'काम तो करना पड़ेगा, तब तो तनख्वाह मिलेगी।'
'वह बात नहीं है सर, हमें तनख्वाह और 'कमीशन' दोनों मिलता है।'
'अरे वाह, फिर क्या समस्या है ?'
'हमारी कंपनी की ब्याज दर अन्य कंपनियों और बैंकों के मुक़ाबले अधिक है, ग्राहक को समझाने में बहुत मुश्किल होती है।'
'फिर?'
'हमारा टार्गेट इतना अधिक रहता है कि छोटे-मोटे 'केसेज़' तो हम लोग छूते नहीं, 'जेबीसी', ट्रक या ट्रेक्टर वालों को पकड़ते हैं।'
'ठीक है, फिर ग्राहक को कैसे समझाते हो ?'
'सर, ग्राहक को बताने के लिए हमने कुछ अन्य कंपनियों और बैंको के 'बोगस फोल्डर' तैयार करवा लिए हैं जिनमें उनकी ब्याज दर से हमारी ब्याज दर
से अधिक प्रिंट करवा ली है और उसे दिखाकर ग्राहक को समझाते हैं कि हमारे 'रेट' दूसरों से कम है।'

'ये तो बेईमानी है।'
'क्या करें, बिजनेस के लिए करना पड़ता है।'
'कल के दिन ग्राहक को मालूम पड़ा तो ?'
'पड़ता रहे, हमें बिजनेस मिल गया, फायनेंस हो गया, उसके बाद ग्राहक हमारा क्या बिगाड़ेगा ?'
'धोखाधड़ी की शिकायत कर सकता है।'
'ऐसे कैसे करेगा ? बैंक वाला फोल्डर उसको दिखाते भर हैं, देते कभी नहीं।'
'ओह, तो आपको परेशानी क्या है ?'
'बहुत दिल दुखता है सर, आत्मा धिक्कारती है, रात को नींद नहीं आती।'
'फिर'?
'आप बताइए सर, क्या करूँ ?'
'आत्मा धिक्कार रही है तो यह काम छोड़ दीजिए, कुछ और कीजिए।'
'अच्छी सलाह दे रहे हैं आप, ऐसे में मैं भूखे मर जाऊंगा !'
'ईमानदारी से काम करने वाला भूखा नहीं मरता, मेरे भाई।'
'कैसा करूँ ?'
'अपनी आत्मा और अपनी बुद्धि में वार्तालाप चलने दीजिए, कुछ-न-कुछ निष्कर्ष निकलेगा।' मैंने कहा।

कवि प्रदीप ने लिखा था : 

'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान 
कितना बदल गया इंसान
सूरज न बदला चांद न बदला न बदला रे आसमान 
कितना बदल गया इंसान.'

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(11)
     
सन 2012 में मैंने आत्मकथा लगातार लिखना चालू किया, वह भी ब्लॉगर में. उसी साल मैं 'फेसबुक' से जुड़ा और जो लिखता था उसके अंश फेसबुक में डाल देता था. आत्मकथा पाठकों तक पहुंचने लगी, उन्हें पसंद आने लगी और फिर जो कभी-कभी लिखता था, उसे रोज लिखने लग गया. विश्व के 26 देशों में पाठक बन गए जिनमे  सर्वाधिक भारत में और उससे कम अमेरिका में, उसके बाद अन्य देश. 

दिल्ली में मेरे एक फेसबुक मित्र हैं, श्री अरविंद पथिक, उन्होंने मुझसे आत्मकथा को पुस्तक के रूप में लाने पर बहुत जोर दिया. उनका मानना था कि कि ब्लॉग को कम लोग पढ़ते हैं, पुस्तक के पाठक अधिक होते हैं. न-नुकुर करते-करते अंततः मैंने अपना मन बनाया और 

पता लगाने की कोशिश की कि पुस्तक कैसे प्रकाशित होगी? सबसे पहले ज्ञानपीठ और वाणी प्रकाशन का नाम सामने आया लेकिन वहां की प्रक्रिया लंबी और अनिश्चित समझ में आई तो डायमंड बुक्स से बात करने का विचार किया. डायमंड का ए.एच.व्हीलर से गठबंधन था और देश भर में संचालित बुक स्टोर्स से उनके व्यापारिक सम्बंध ज्ञात हुए इसलिए वहां से पुस्तक प्रकाशित करवाने का निर्णय लिया. मैंने इस संबंध में अरर्विंदजी से बात की तो उन्होंने कहा, 'दिल्ली आ जाइए, मेरे एक परिचित हैं उनके डायमंड से अच्छा संपर्क है, उनके माध्यम से आपका काम आसानी से हो जाएगा.' मैं दिल्ली पहुंच गया.  

हम लोग उन्ही की कार में डायमंड प्रेस पहुंचे, वहां के मालिक नरेंद्र कुमार वर्मा से मुलाकात हुई. उन्होंने पुस्तक छापने का मूल्य पचास हजार रुपए बताया और कहा कि एक हजार प्रतियां छपेंगी, तीन सौ मुझे देंगे, शेष उनकी होगी. एक अनुबंध में हस्ताक्षर करवाए जिसमें इस बात का भी ज़िक्र था कि एक हजार प्रतिया बिक जाने पर वे मुझे 12% रायल्टी देंगे. मैंने प्रकाशक को चेक दे दिया. उसके बाद जो सज्जन हमें साथ लेकर गए थे उन्होंने हम दोनों को केबिन से बाहर का रास्ता बता दिया और बोले, 'मुझे जरा निजी बात करनी है.' हम लोग बाहर हो गए. मैं विस्मित हो गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया लेकिन बात आई-गई हो गई.

 वहां से वे हम लोगों को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ले गए जहां दिल्ली का अभिजात्य वर्ग गोल-टेबल के इर्द-गिर्द बैठकर शराब-नोशी करते हुए बातचीत में मशगूल था. कुछ हस्तियों से उन्होंने मेरा बहुत बड़े साहित्यकार के रूप में परिचय कराया, मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि जिस व्यक्ति की अभी तक एक किताब प्रकाशित नहीं हुई है, वह 'बड़ा साहित्यकार' कैसे हो गया? बातचीत के दौरान उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि दिल्ली के किसी बड़े सभागार में कुछ नामचीन साहित्यकारों के करकमलों से वे मेरी पुस्तक का विमोचन और परिचर्चा आयोजित करेंगे और 'देखना आप, आपकी और आपकी पुस्तक की चर्चा पूरे देश में होने लगेगी.' उनकी बातें सुनकर मुझे प्रसन्न होना चाहिए था लेकिन मेरे कान चौकन्ने हो गए. मैं उनसे छुटकारा पाकर बिलासपुर लौट आया. 

एक माह बाद पुस्तक छ्प कर मेरे पास आ गई. अपनी पहली पुस्तक देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. बढ़िया कवर पेज, अच्छी और दोषरहित छपाई ने आनंद द्विगुणित कर दिया. यह आनंद तीन गुना तब हो गया जब इसकी बिक्री अमेज़ान में तेजी से बढ़ी. यह पुस्तक फिल्म 'जय संतोषी माता' की तरह हिट हो गई. तीन साल बीत गए, फिर भी प्रकाशक की ओर से रायल्टी की कोई खबर नहीं आई तो मैंने उन्हें ई.मेल पर लिखा कि वे बताएं कि कितनी पुस्तकें बिकी और कितनी स्टाक में हैं. उनका उत्तर आया, 'यह बताना हमारी पालिसी में नहीं है.' किताब को प्रकाशित हुए तेरह साल हो गए हैं, आज तक एक रुपया भी मुझे रायल्टी प्राप्त नहीं हुई. डायमंड के मालिक आदरणीय नरेंद्र कुमार वर्मा इस बीच इस असार संसार से मुक्त होकर ऊपर चले गए, अब किससे और क्या शिकायत करें? जय श्री राम. 

इस बीच मेरी आत्मकथा का दूसरा खंड लिख कर तैयार हो गया था. मेरे एक जयपुरिया मित्र ने मुझे जयपुर के बोधि प्रकाशन से उसे प्रकाशित करवाने का सुझाव दिया. मैंने प्रकाशन के मालिक श्री माया मृग से फोन पर बात की, उन्होंने पाण्डुलिपि मंगवाई, मैंने भेज दी. उन्होंने पढ़कर अपनी सहमति दी और बीस हजार रुपए की मांग की, मैंने चेक भेज दिया. कवर पेज के लिए मैंने छिंदवाड़ा के रोहित रूसिया द्वारा बनाया गया एक रेखा चित्र पसंद किया, वे भी मान गए. पुस्तक छप कर आ गई. तब मेरी बनिया बुद्धि को तब समझ में आया, 'द्वारिका, दिल्ली वाले प्रकाशक ने तीस हजार रुपए अधिक लेकर तुम्हें ठग लिया.' खैर जो उसने किया, सो किया लेकिन अनुबंध के अनुसार उसे रायल्टी तो देना था, वह उसे भी डकार गया. वह चालाक निकला और मैं निरा बुद्धू. मेरे पिता कहा करते थे कि कई बार जानबूझ कर बुद्धू बन जाना फायदे का सौदा होता है. मुझे इस प्रकरण से यह फायदा हुआ कि मैं यह समझ गया कि मैं बुद्धू बनने के लिए ही इस संसार में आया हूं. 

एक साल में तीसरा खंड तैयार हो गया. इस बार फिर से बोधि प्रकाशन को छापने के लिए दिया, पंद्रह हजार रुपए लगे. उसके अगले साल संस्मरण-कथा संग्रह 'याद किया दिल ने' वहीं से छपा. खुशी की बात यह थी कि उस समय तक मेरी पुस्तकों की बहुत अच्छी बिक्री होने लग गई थी संभवतः इसलिए प्रकाशक जी ने रुपया लिए बिना मेरी पुस्तक प्रकाशित कर दी. आठ पुस्तकें और भी प्रकाशित हुई, विभिन्न प्रकाशकों यथा, रश्मि प्रकाशन (लखनऊ), वैभव प्रकाशन (रायपुर) और भावना प्रकाशन (नई दिल्ली) से, सबने केवल मुस्कुराहट की कीमत पर मेरी पुस्तकें प्रकाशित की.

चूंकि बात पुस्तकों की चली इसलिए यहां पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मेरा लिखना कब और कैसे शुरू हुआ?  

अब्राहम मास्लो ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया है, मनुष्य की जरूरतों के बारे में, एक त्रिभुज के आधार पर उसने अपनी बात समझाई है. त्रिभुज में तीन कोण होते हैं, नीचे चौड़ा और ऊपर संकरा. नीचे चौड़ा का भावार्थ है, अधिकतर लोग और ऊपर संकरा का भावार्थ, बहुत कम लोग. तो, नीचे से शुरू करते हैं, मनुष्य की सबसे पहली जरूरत है, रोटी और कपड़ा. जब रोटी और कपड़े की व्यवस्था हो जाती है, उसके बाद दूसरे चरण में सुरक्षा की बात आती है. घर हो जाता है, पशुओं और कीड़े-मकोड़ों से सुरक्षा हो जाती है तो मनुष्य खुद को सुरक्षित महसूस करने लगता है. सुरक्षा के पश्चात तीसरे चरण में उसके मन में चाहत होती है कि उसे समाज में  पहचाना जाए. पहचान के लिए उसको समाज में मिलना-जुलना होता है, वह विभिन्न कार्यक्रमों में सम्मिलित होता है. विभिन्न समूहों या राजनीति में भाग लेता है. कुछ लिखना भी शुरू करता है ताकि उसके लेखन से लोग परिचित हों. इस प्रकार उसका परिचय का दायरा बढ़ता है. इस जरूरत के पूरे होने के बाद चौथे चरण में मान-सम्मान की इच्छा जागृत होती है. वह कुछ ऐसा अनोखा और अद्भुत कार्य करना चाहता है जिससे समाज में लोग उसे मान-सम्मान देंं. लेखन, कविता, नृत्य, संगीत, फोटोग्राफी, खेल-कूद आदि किसी क्षेत्र में अपने हुनर का प्रदर्शन करता है. जब ये चारों जरूरतें पूरी हो जाती हैं, उसकी सांसारिक जरूरतें पूरी हो जाती हैं तब उसे पाँचवे चरण में आत्मबोध होता है, मतलब, मैं कौन हूं, इस संसार में क्यों आया जैसे प्रश्न उसके दिमाग में उठने लगते हैं. इस जरूरत को पूरा करने के लिए वह गहन पठन-पाठन में संलग्न हो जाता है, उसका झुकाव आध्यात्म की ओर होने लगता है.

लेखन की शुरुआत तीसरे चरण में शुरू होती है, अर्थात जान-पहचान या परिचय के विस्तार से. जब वह दूसरों के द्वारा लिखे हुए लेख या कविता को पढ़ता है तो उसके मन में आता है कि मैं भी लिखूं. कुछ लोग इसमें सफल हो जाते हैं, कुछ लोगों से नहीं बन पाता. जिनसे बनता है, वे अपनी रचना सुनाकर या फेसबुक में पोस्ट करके या कहीं छपवा कर खुश हो जाते हैं. यहीं से उनका परिचय संसार बढ़ता है. धीरे-धीरे उनकी रचना में निखार आने लगता है और वे जरूरत के चौथे चरण में पहुंच जाते है, अर्थात, मान-सम्मान वाले खांचे में. तीसरे चरण में पहुंचने वाले अधिक होते हैं, चौथे चरण में पहुंचने वाले कम और पांचवे चरण में बहुत ही कम. मैंं चौथे चरण तक पहुंचने में सफल हो गया हूं.  

मेरा लेखन 65 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ, उसके पहले मैं व्यापारी था, प्रशिक्षक था, उसके बाद लेखक बना. सामान्यतया लेखक अपनी आत्मकथा जीवन के अंतिम समय में लिखा करते हैं, मैंने अपना लेखन आत्मकथा लिखने से शुरू किया. लेखक को कुछ लिखने के पहले विषय की तलाश करनी होती है, फिर विचार की, उसके बाद शब्द की, शिल्प की. मेरे पास मेरे जीवन में घटी हुई घटनाओं का वृहद संसार था इसलिए विषयवस्तु की कमी नहीं थी, केवल उसे शब्द देने थे, उन्हें कालानुसार पिरोना था. शब्द और शिल्प की समस्या मेरे साथ नहीं थी क्योंकि पचीस वर्षों तक प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़े रहने के कारण उनका मेरे पास पर्याप्त भंडार था. मैं कोई पढ़ा-लिखा ट्रेनर नहीं था, बिजनेस मेनेजमेंट की डिग्री भी मेरे पास नहीं थी फिर भी जेसीज़ इंटरनेशनल के माध्यम से मैं इंटरनेशनल ट्रेनर बन गया था, इस वज़ह से प्रशिक्षण के क्षेत्र में मैं प्रविष्ट हो सका.  व्यक्तित्व विकास और व्यवहार विज्ञान के विभिन्न विषयों का प्रशिक्षण मैंने करीब 25 वर्षों तक किया. शताधिक सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों, शिक्षण संस्थानों की कार्यशालाओं में हज़ारों लोगों को प्रशिक्षित करने का मुझे सुअवसर मिला. 

प्रबंधन मनुष्य का हो या संगठन का, बहुत कठिन विषय है. मोटी-मोटी किताबों को अंग्रेजी भाषा में पढ़कर उसे समझना, फिर उन्हें हिंदी भाषा में अनूदित करना और उसके पश्चात आम बोलचाल की भाषा में प्रशिक्षुओं को बताना-समझाना मुझे अत्यंत रोचक लगा, मेरा उस कार्य में बहुत दिल लगा और मेरे काम और नाम की चर्चा हिंदी‌भाषी क्षेत्रों में फूलों की खुशबू की तरह फैलने लगी. उसके बाद 2003 में मेरे दाहिने गाल में कैंसर हुआ, सर्जरी हुई, 2008 में फिर से उसी गाल में कैंसर हुआ, अबकी बार ज़रा और बड़ी सर्जरी हुई, 2009 में बाएं गाल में कैंसर हो गया, उसकी भी सर्जरी हुई. इन तीन सर्जरी की वज़ह से मुझे बोलने में असुविधा होने लगी, उच्चारण में दोष आ गया इस कारण मैंने प्रशिक्षण देना बहुत कम कर दिया और बेचैन रहने लगा कि आगे का जीवन आखिर जियूं तो कैसे जियूं? 

सन 2012 में मेरे हाथ लेपटाप लगा, मैं फेसबुक से जुड़ा तब मेरे इस लेखकीय जीवन की शुरुआत हो गई. प्रशिक्षण के दौरान मैंंने जो सीखा और सिखाया, वह मेरे लेखन की प्रक्रिया में बहुत काम आया. यदि आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि मेरे लेखन में वर्णित घटनाओं के अतिरिक्त वे बातें भी होती हैं जो प्रशिक्षण के दौरान मैंंने सीखी-सिखाई थी. 

बचपन से प्रौढ़ावस्था तक मैंं संयुक्त परिवार से जुड़ा रहा, सक्रिय रूप से भागीदार रहा. इस पारिवारिक व्यवस्था ने मुझे खुशियाँ कम दी, कष्ट और दुख बहुत दिए. असल में उन परिस्थितियों का सामना मुझे स्वयं की गलतियों के कारण भुगतना पड़ा. संयुक्त परिवार में जो सदस्य बुद्धिमान या व्यवहारिक होते हैं वे फायदे में रहते हैं और जो भावुक होते हैं वे सताए जाते हैं. भावुकतावश वे अपना बड़ा जीवन काल परिवार के हित में होम कर देते हैं लेकिन कालांतर में परिवार से उन्हें शाबासी मिलने की जगह आलोचना और निराशा हाथ लगती है. स्वाभाविक है, जो परिवार में काम करता है उसे बिना उसकि अहमियत समझे सहज और स्वाभाविक मान लिया जाता है, उसका कोई खास महत्व नहीं होता. दरअसल, मेरी भावुक स्वभाव ने मुझे बहुत सताया. 

हमारे आसपास लाखों संयुक्त परिवार हैं जिनमें ऐसा ही कुछ घटित हो रहा है. मैंने अपने जीवन की घटनाओं को सबके सामने खोल कर रख दिया ताकि उसे पढ़ कर लोग स्वयं मूल्यांकन करके देख सकें कि कहीं वे भी तो ऐसी स्थितियों के शिकार नहीं हो रहे हैं? यदि है तो उन्हें अभी सचेत हो जाना चाहिए और दूसरे विकल्प की तलाश करनी चाहिए. संयुक्त परिवार की विसंगतियों से पीड़ित इस इंसान ने अपने अनुभवों को वे शब्द दिए जो संयुक्त परिवारों से जुड़े हुए अधिकांश लोगों का दुख-दर्द है. हर व्यक्ति जो इस आत्मकथा को पढ़ता है, इसकी घटनाओं में खुद को तलाशता है और मुझसे पूछता है, 'मेरी कहानी आपको कैसे मालूम पड़ी ?''

मेरे उपन्यास 'मद्धम मद्धम' और 'परदेसी जाना नहीं' दोनों की पृष्ठभूमि अलग-अलग है. 'मद्धम मद्धम' में एक निम्नवर्गीय परिवार में पल-बढ़ रही कन्या के संघर्ष की कहानी है जो अपने परिवार की समृद्धि के लिए कुछ करना चाहती है. जब अदालत में वह वकालत करने जाती है तो न्याय व्यवस्था के दोषों से उसका आमना-सामना होता है, उन दोषों को दूर करने के लिए वह जज बनने का लक्ष्य निर्धारित कर लेती है और उसे ईमानदारी से हासिल करने का प्रयास करती है. दूसरा उपन्यायास 'परदेसी जाना नहीं' देश विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आकर बस गए एक सिंधी परिवार की कथा है. माता-पिता दोनों वृद्ध हो गए हैं, रोगग्रस्त हैं लेकिन उनका बड़ा बेटा व्यापार करने के लिए दूसरे शहर में जाकर बस गया है और छोटा बेटा अमेरिका में पढ़-लिखकर वहीं नौकरी कर रहा है, उनकी देखरेख के लिए कोई नहीं है. यह समस्या इन दिनों भारत में आम है लेकिन इसका कोई उपाय नहीं दिखाई देता. बुजुर्ग अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और उनके बच्चे अपना रोजगार या नौकरी नहीं छोड़ सकते. इस उपन्यास में इस समस्या का एक समाधान खोजने की कोशिश की गई है जो नई पीढ़ी के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन सकती है.

कथा संग्रह 'याद किया दिल ने' और 'तेरी मेरी कहानी है' की विषयवस्तु मेरी देखी-सुनी-समझी हुई है. किशोरावस्था में हम लोग 'धर्मयुग' साप्ताहिक पत्रिका पढ़ा करते थे. उसी 'धर्मयुग' में मैंने कवयित्री महादेवी वर्मा जी के कुछ शब्द-चित्र पढ़े थे जो उन्होंने अपने आसपास के लोगों के बारे में लिखे थे. लिखा हुआ तो याद नहीं रहा क्योंकि उस बात को पचास साल से ऊपर हो गये लेकिन उसका असर याद रहा मुझे. इन कहानियों का बीजारोपण उसी समय हो गया था लेकिन पल्लवित होने का अनुकूल समय अब आया, जब मैं इसे लिख पाया. यह सच है कि इन शब्दचित्रों का लेखन महादेवी जी के उसी लेखन से प्रेरित है. सभी पात्र वास्तविक हैं लेकिन इसे रोचक और पठनीय बनाने के लिए मैंने इसे कहानी की शैली में लिखा है. बेशक, कहानी है तो कल्पना भी है, कल्पना है तो सच्चाई से तनिक दूरी भी. ऐसा समझिए कि घर में खीर बनती है तो उसमें इलायची, केसर, काजू, किसमिस डालते हैं न? बस, उतना मिश्रण है कल्पना का, बाकी, सच्चे किस्से हैं जो मैंने अपने जीवन में देखे या सुने हैं.

यात्रा करना मनुष्य का शौक माना जाता है जबकि यह अनिवार्यता भी होती है. शौक उनका है जो आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम है, दुनिया को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं. अनिवार्यता उनकी है जिन्हें मंदिर में प्रार्थना या मनौती करनी है, रिश्तेदारी या नौकरी पर जाना है, इलाज़ करवाना है, अपना माल बेचने के लिए दर-दर भटकना है. मेरे लिये यात्रा करना अपने जीवन के शेष रह गये काम को निपटाना है. जब घूमने-फिरने के दिन थे तब जेब खाली थी, अब जब मेरी जेब में ख़र्च करने के लिए कुछ है तो मेरे साठोत्तर शरीर की परेशानियां हाज़िर हैं. फिर भी, मैं उतना अशक्त नहीं कि चल-फिर न सकूं इसलिए जब भी शहर से बाहर निकलने का कोई अवसर मुझे मिलता है तो मैं ट्रेन में बाद में बैठता हूँ, उस जगह पर दिमागी तौर पर पहले ही पहुँच जाता हूँ. वैसे, सड़क या वायुमार्ग के बदले मुझे रेल की पटरियां अधिक पसंद हैं. रेल यात्रा में सिकुड़ कर बैठने की तकलीफ नहीं झेलनी पड़ती, दूसरे की छोड़ी हुई सांस को लेने की मज़बूरी नहीं होती, जब मन पड़े आराम से लेट जाओ, जब मन पड़े सामने बैठे अनजान व्यक्ति से बातें करो या चुपचाप उसे ताकते-निरखते रहो. जब भूख लगे, पास में रखा सामान निकालो और खा लो या किसी स्टेशन में उतरकर कुछ खरीद कर खा लो. बैठे-बैठे या सोते-सोते ऊब गए हों तो ट्रेन जहाँ खड़ी हो, डब्बे से उतर कर कमर सीधी कर लो या अपने पैरों को चलायमान कर लो. फिर, ट्रेन की टिकट सस्ती पड़ती हैं, हवाई मार्ग या सड़क मार्ग के मुकाबले 'पाकेट फ्रेंडली' होती हैं. इन सब कारणों से मुझे ट्रेन की यात्रा तुलनात्मक रूप से अधिक पसंद है.


'मुसाफिर..जाएगा कहाँ' और 'कहाँ ले चले हो..बता दो मुसाफिर' में विगत वर्षों की यात्राओं पर मेरे द्वारा लिखे गए कुछ संस्मरण हैं. इन यात्राओं में मेरी दृष्टि स्थूल पर कम थी, मानवीय व्यवहार पर अधिक. इन यात्राओं में मैंने अपने भारत को देखा, कुछ विदेशों की भी यात्रा की और जो कुछ देखने में आया उससे समझ में आया कि अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए घर से बाहर निकलना ज़रूरी है. बाहर की दुनिया देखने से दुनिया समझ में आती है.

विगत 14 वर्षों में मैंने आत्मकथा लिखी, उपन्यास लिखे, यात्रा वृतांत लिखे, कथा और लेख संग्रह प्रकाशित हुए. दो अनोखे विषयों पर भी पुस्तकें आयी, एक हिंदी सिनेमा पर आधारित 'सिनेमची' और दूसरी फेसबुक में लिखी गई पोस्ट का संग्रह 'ज़रूर कोई बात है.' बस, इतनी सी मेरी साहित्य यात्रा है.

मैं स्वभावतः आलसी प्रवृत्ति का मनुष्य हूं और यदि कभी कुछ लिखा है तो अपने स्वभाव के खिलाफ जाकर लिखा, जबर्दस्ती लिखा है. मतलब यह है कि शरीर बोलता है, 'यार क्यों लिखना? आराम से चादर तान कर सो, या दोस्तों के साथ गप करो या बैठे-बैठे अपनी पत्नी को निहारो' लेकिन अचानक कोई अंदरूनी दबाव काम करने लगता है कि यह जो थोड़ा सा जीवन बचा है, अपनी पुरानी यादों को शब्द दे दो, कुछ लिख लो ताकि उनका दस्तावेजीकरण हो जाए ताकि ये बातें आने वाली पीढ़ी को मालूम हो सके कि हमने अपना जीवन कैसे जिया, अन्यथा वह सब इस देह के साथ भस्मीभूत हो जाएगा और दिल की बात दिल में ही रह जाएगी.
किशोरावस्था में हर एक व्यक्ति अपने मनपसंद विषय पर कुछ लिखने की कोशिश करता है. अक्सर ये कोशिशें शुरुआत में ही भसक जाती हैं, कुछ न कुछ व्यवधान हो जाता है. युवा हो जाने के बाद फिर से कोशिश की जाती है. नए लेखक के सामने पहली समस्या आती है कि किस विषय पर लिखूं. लिखने के पहले खूब पढ़ना पड़ता है, आसपास की दुनिया को गौर से देखना पड़ता है, उन पर मनन करना होता है, फिर लिखने की हिम्मत जुटानी पड़ती है, फिर दृष्टा के रूप में तटस्थ होकर लिखना पड़ता है, तब कहीं जाकर साहित्य लेखन होता है. तेज गति से जाने वाले वाहन में सवार होकर अगल-बगल नहीं देखा जा सकता, पैदल चलने से ही आस-पास दिखाई देता है. इस आसपास होने वाली हर घटना और व्यक्ति के पीछे कोई न कोई कहानी होती है. उसे गौर से देखना, समझना और फिर उसे शब्द देना ही लिखना होता है.

मेरे साथ होता यह है कि जब मैं अपने लेपटॉप के की-बोर्ड पर उंगलियां रखता हूँ, अचानक मेरी याददास्त के दरवाजे खुल जाते हैं और बीते हुए जीवन की घटनाएं मुझे याद आने लगती है, और, उन्हें अनायास शब्द मिलने लगते हैं. मैं कागज पर कुछ नहीं लिखता, लेपटॉप पर ही लिखता हूँ, इस वज़ह से मेरा लिखा हुआ सब कुछ लेपटॉप में सुरक्षित है. आधुनिक युग की इस आविष्कार के कारण कागज की बचत हो जाती है और अपना लिखा हुआ खोजने में सुविधा भी.
कुछ लिखने के लिए न मुझे दिन से परेशानी है न रात से, न गरमी से न बरसात से और न ही ठंड से. लिखने के पहले अपना ध्यान केंद्रित करता हूँ, किस विषय पर लिखना है, यह विचार करता हूँ. लेपटॉप मेरे सामने होना चाहिए और किसी प्रकार का व्यवधान नहीं होना. जब भी ऐसी अनुकूल परिस्थिति मिलती है, मेरा लेखन चालू हो जाता है. शुरू में मैं एकदम निर्विचार होता हूँ लेकिन जैसे ही उंगलियां की-बोर्ड को छूती हैं, विचार दिमाग में इस तरह उतरते हैं जैसे आसमान में फैले काले बादल सहसा बरसने लग गए हों. एक या दो पेराग्राफ लिख पाता हूं, उसके बाद उसे गौर से पढ़ता हूँ, आवश्यक संशोधन करता हूँ, उसके बाद छुट्टी. मेरा आलस्य मुझ पर कब्जा कर लेता है. 
मेरे लिखने का यह उत्साह 65 वर्ष की उम्र में आरम्भ हुआ और अब 79 वर्ष की उम्र में बखूबी जारी है. मेरी मान्यता है कि लिखना एक प्रकार का गैर-मियादी बुखार है, जब चढ़ता है, तब लेखन अपनी गति पकड़ता है और जब तक बुखार उतरता नहीं, तब तक लेखक लिखते रहता है, अनवरत.

मेरी कविता है :

'यदि मुझे लिखना आता
तो सबसे पहले यह लिखता
कि मत लिखो।
आखिर लिखा हुआ कितना पढ़ा जाएगा?
और पढ़ा हुआ कितना समझा जाएगा?
फिर समझा हुआ कितना टिकेगा?
पल दो पल।
लिखा हुआ भी क्षणभंगुर है
क्षणभंगुर जीवन की तरह।'

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